एफवाईयूपी पर जारी घमासान का भले ही अब हल निकल गया हो लेकिन जिस तरह से इस विवाद का राजनीतिकरण हुआ, उससे इस केंद्रीय विश्वविद्यालय के इतिहास में एक काला अध्याय जुड़ गया है।
वर्ष 1922 से स्थापित डीयू के इतिहास में पहली बार ऐसा मौका देखने को मिला कि दाखिलों की प्रक्रिया को कटऑफ लिस्ट जारी होने से पहले रोक दिया गया।
डीयू ने एफवाईयूपी को लेकर कोई पहला प्रयोग किया हो, ऐसा नहीं है। इससे पहले वर्ष 2009 में परंपरागत कोर्सों में सेमेस्टर प्रणाली लागू कर उसने कई विवि व संस्थानों को इसकी उपयोगिता मानने को मजबूर कर दिया।
लेफ्ट से जुड़े छात्र संगठनों भड़काई थी चिंगारी
एफवाईयूपी को लागू करने की घोषणा 27 अप्रैल 2013 को कुलपति ने सत्र 2013-14 के लिए की तो शिक्षा जगत में इस पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई, लेकिन लेफ्ट से जुड़े दिल्ली कें विश्वविद्यालयों में सक्रिय छात्र संगठनों आइसा, एसएफआई, एआईएसएफ, डीएसयू आदि ने इसे ‘राइट’ मानने से इंकार कर दिया।
इन संगठनों के बाद धीरे-धीरे एबीवीपी व एनएसयूआई ने भी इस मुद्दे को उठाया। हालांकि कांग्रेस सरकार के समय में लागू इस प्रोग्राम पर एनएसयूआई ने गत वर्ष के बजाय इस वर्ष सक्रियता बढ़ाई। विभिन्न दलों के अलावा भाजपा के नेताओं के एफवाईयूपी पर आए बयानों से यह स्थिति पिछले सप्ताह ही स्पष्ट हो गई कि अब इस पर बड़ा राजनैतिक घमासान होगा।
'इसके लिए यूजीसी जिम्मेदार है'
डीयू प्रशासन व यूजीसी पिछले सप्ताह भर से अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे और दाखिले संकट में पड़ते देख देशभर यहां तक कि विदेशों से आवेदन करने वाले छात्रों को इस विश्वविद्यालय के बारे में सोचना पड़ा।
जाहिर है कि राजनैतिक बयानबाजी, बैनर और झंडों के साथ जुटे रहे छात्र संगठनों ने माहौल गरमाया। तमाम घटनाक्रम के बीच डीयू का यह काला अध्याय बार-बार सामने आता रहेगा। माना जा रहा है कि इस घटनाक्रम के बाद आने वाले समय में डीयू के कामकाज पर राजनैतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा।
पूर्व केंद्रीय मंत्री व दिल्ली छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष विजय गोयल का मानना है कि ग्रेजुएशन प्रोग्राम को तीन वर्ष का करने का सभी राजनैतिक दल समर्थन कर रहे थे। ऐसे में एफवाईयूपी के विरोध के दौरान यूजीसी ने पिछले साल चुप्पी साधे रखी और इस साल हटाने का दबाव बनाता रहा। इस स्थिति के लिए पूरी तरह से यूजीसी जिम्मेदार है।