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केजरी और लवली के मुकाबले कौन होगा बीजेपी का सूरमा?

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सांसदों को दिल्ली प्रदेश की सक्रिय राजनीति से दूर रखने के भाजपा के नियम ने जहां दूसरी और तीसरी पीढ़ी के नेताओं को आगे बढ़ने का मौका दिया है तो वहीं प्रदेश भाजपा में नेतृत्व संकट की चुनौती भी दे दी है।
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गिने-चुने कुछ नेताओं को छोड़ दें तो अब पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह के कद के नेताओं का अभाव साफ झलक रहा है।

ऐसे में पार्टी के भीतर भी चिंता बन आई है कि नेतृत्व किसके हाथ में सौंपा जाए।

हर्षवर्धन के जाने से बढ़ी ये मुश्किल

पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की सबसे बड़ी समस्या मुख्यमंत्री का प्रत्याशी तय करने को लेकर थी, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कद के सामने भाजपा का कोई भी नेता नहीं टिक रहा था।

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भी अपनी पैठ दिल्ली की जनता में बना चुके थे। यही वजह था कि आनन-फानन में भाजपा ने राज्यसभा सांसद विजय गोयल के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छीनकर चुनाव के कुछ दिन पूर्व ही वर्तमान सांसद डॉ. हर्षवर्धन को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की मजबूरी बनी।

उन्हें मुख्यमंत्री का प्रत्याशी भी बनाया गया। ये अलग बात है कि शीला दीक्षित चुनाव हारने के बाद राजनीति में हाशिए पर चली गई है।

भाजपा के लिए बड़ी चुनौती हैं केजरीवाल

पार्टी के रणनीतिकारों की मानें तो आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती आम आदमी पार्टी के संयोजक व पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कद का नेता देने को लेकर होगी।

इसी तरह कांग्रेस ने भी अपने दिग्गजों को अब प्रदेश की राजनीति में उतार दिया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, अजय माकन, सांसद जयप्रकाश अग्रवाल समेत कई नेता फिर से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हो गए है।

लिहाजा भाजपा के सामने कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की भी चुनौती होगी।
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इन नेताओं का नहीं है विशेष वजूद!

प्रदेश भाजपा की बात करें तो प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा अब सक्रिय राजनीति में दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना भी अस्वस्थ है। डॉ. हर्षवर्धन, मीनाक्षी लेखी, रमेश बिधूड़ी और प्रवेश वर्मा सांसद बन चुके है।

अभी की स्थिति देखें तो प्रदेश भाजपा में प्रो. जगदीश मुखी, विजेंद्र गुप्ता, नंद किशोर गर्ग और राज्यसभा सांसद विजय गोयल के अलावा कोई नेता बड़े कद का नहीं है।

अगर जनाधार की बात करें तो ये नेता अपना विशेष वजूद नहीं रखते है। ऐसे में समस्या चुनाव के दौरान गहराती दिखाई पड़ रही है।
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