देश में हर साल 27 हजार से ज्यादा बधिर शिशु जन्म ले रहे हैं। इनमें से कई फीसदी बच्चे ऐसे भी हैं, जिन्हें सुनने के साथ बोलने की क्षमता भी जाने लगती है। आंकड़ों की मानें तो वर्ष 2001 में देशभर में करीब छह करोड़ बधीरता की समस्या से जूझ रहे थे। जिनकी संख्या वर्ष 2011 तक 22.4 प्रतिशत तक बढ़ गई है। डॉक्टरों का मानना है कि इसकी बड़ी वजह है अभिभावकों में जागरूकता का आभाव।
सोमवार को आयोजित एक कार्यक्रम में बत्रा अस्पताल के ईएनटी डॉ. सुनील कथूरिया का कहना है कि जन्म लेने के दो वर्ष तक शिशुओं में विकास तेजी से होता है। नवजात पहले छह महीनों में अपने आस पास से आने वाली सभी आवाजों को सुनता है और दिमाग के मेमोरी में बिठाता जाता है।
बाद में वह इन्हीं सुने हुए शब्दों और आवाजों की नकल कर बोलता है। लेकिन अगर नवजात इन आवाजों को न सुन पाए तो वह बोल भी नहीं पाएगा। इसलिए वे नवजातों के जल्द से जल्द श्रवण क्षमता की जांच की सलाह देते हैं।
वहीं, डॉ. संजय जैन का कहना है कि करीब एक तिहाई मामले गर्भवती महिला या नवजात में संक्रमण की वजह से होते हैं। यह रूबेला, मेनेजाइटीस, मीजल्स या कान में संक्रमण में से किसी भी कारण से हो सकता है। इसके अलावा ऑटोटॉक्सिक दवाओं के इस्तेमाल की वजह से भी बधिरता हो सकती है।
उन्होंने बताया कि जन्म से आई बधिरता को ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन जन्म के बाद आई बधीरता में टींपैनोप्लास्टी जैसे सर्जरी से उपचार किया जाता है।