टीएचए की सोसायटियों में रह रहे लोगों को कहना है कि इस बार के चुनाव में कोशी और कोरोना के मुद्दे को लेकर उनकी रुचि और बढ गई है। यह भी उनके लिए रोचक है कि कोरोना काल में चुनाव का क्या रंग होगा। एक मोटे अनुमान के अनुसार इंदिरापुरम में करीब डेढ़ लाख लोग बिहार के मूल निवासी हैं। वसुंधरा, वैशाली, कौशांबी और मोहननगर के में लाखों की संख्या में बिहार के लोग रहते हैं। इनके बीच अभी से कोशी और कोरोना का मुद्दा लहराया जा रहा है। सोसायटी वासियों का कहना है कि जीत और हार से उन्हें मतलब नहीं है, उन्हें अच्छे उम्मीदवार की दरकार है।
मानसी जंक्शन से आगे बढ़ते ही हमारी ट्रेन बड़ी पटरी से छोटी पटरी पर आ जाती थी। अब कुछ वर्षों से बड़ी पटरी पर ट्रेन चलने लगी है लेकिन पटरी के दोनों ओर के दृश्य नहीं बदले हैं। सिमरी बख्तियारपुर पहुंचने के पहले तक दोनों ओर समुंदर की तरह कोशी नदी का विकराल रूप दिखता है। कोशी कछार के लोगों का जीवन आज तक नहीं बदला। वसुंधरा में बैठकर यही सोचती रहती हूं कि कब यहां के लोगों को तन भर कपड़ा और पेट भर रोटी मिलेगी। कोशी के कछार पर विकास का बयार देख सकने की उम्मीद से इस बार के चुनाव में बिहार जाउंगी।
रीता सिंह
मैंने दो बार बिहार में बिजनेस करने की कोशिश की। पूर्णिया में प्लांट लगाना चाहा। पर यह संभव नहीं हो सका लेकिन उम्मीद अभी भी है। इसके लिए जरूरत है कि चुनाव में युवा चेहरों का तवज्जो दी जाए, चाहे वह किसी पार्टी के हो। स्थानीय विधायक का क्षेत्र में विकास का लेकर बड़ा रोल होता है। लिहाजा, इस बार मैं वोट डालने से लेकर प्रचार करने तक को बिहार जाउंगा।
अमित विक्रम
कोरोना काल में बहुत से लोग टीएचए से बिहार चले गए। खासकर आर्थिक रूप से पिछड़े लोग अब बिहार से लौटकर यहां आना भी नहीं चाहते। इनका अपनी मिट्टी पर ही जमने के लिए चुनाव एक सुनहरा मौका के रूप में आया है। चुनाव का सदुपयोग करते हुए ये अपने हित में बेहतर उम्मीदवार का चयन कर कर सकते हैं। इनके समर्थन में मैं आगे बढकर काम करूंगी।
रश्मि सिंह
हमलोग हर बार बिहार चुनाव में वोट डालने से लेकर प्रचार करने तक को बिहार जाते हैं। इस बार कोराना के चलते स्थितियां बदली हुई हैं लेकिन लोकतंत्र के इस पर्व को हर हाल में जीना चाहते हैं। सो, खोड़ा से बिहार जाएंगे ही। वहां बेहतर उम्मीदवार को चुनने का माहौल बनाएंगे। वर्चुअल मीटिंग की शुरुआत हो चुकी है जिसमें हम बेहतर बिहार की बात कर रहे हैं।