अदालत ने कहा कि यह पहला मामला है कि जो उस जल्दबाजी को दिखाती है जिसमें पहले एफआईआर दर्ज की गई और फिर पूरे वीडियो का विश्लेषण किया गया। पूछताछ के बावजूद जांच अधिकारी जवाब देने में विफल रहा है कि उसने एफआईआर दर्ज करने की इतनी जल्दी क्यों की, जब उन्होंने पूरा वीडियो नहीं देखा था।
अदालत ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच अधिकारी ने हरियाणा में तंवर के आवास पर छापेमारी की थी। हालांकि, जब वह वहां नहीं मिला तो जांच अधिकारी अन्य पुलिसकर्मियों के साथ तंवर के पैतृक गांव गया और पता चला कि वह हरियाणा का रहने वाला है।
जांच अधिकारी के अनुसार, जांच में पता चला कि तंवर उत्तर प्रदेश के देवबंद में है लेकिन जब 16 जून को उसके गुरुग्राम, हरियाणा में होनने की सूचना मिली तो उसे गिरफ्तार किया गया। जांच अधिकारी के आचरण पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने कहा ये परिस्थितियां कुछ प्रासंगिक सवाल भी उठाती हैं। जब जांच अधिकारी गांव खांडसा गए थे तो वह आरोपी के घर क्यों नहीं गए। वह केवल गांव पहुंचे और जानकारी प्राप्त की कि आरोपी कहीं और रहता है।
अदालत ने सवाल किया कि जांच अधिकारी ने सीआरपीसी की धारा 41ए के तहत गांव के पते पर या गुरुग्राम, हरियाणा में नोटिस लगाने का प्रयास क्यों नहीं किया। अदालत ने कहा कि इससे पता चलता है कि अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य के फैसले का पालन करने का कोई प्रयास नहीं किया गया और जांच अधिकारी बिना अनुपालन के आरोपी को गिरफ्तार करना चाहता था।
अदालत ने यह भी कहा कि 17 जून को ड्यूटी एमएम के आदेश के बावजूद कोई मेडिकल रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई। अदालत ने कहा यह भी तथ्य कि आरोपी भीम सेना का सदस्य है और भीम सेना कोई प्रतिबंधित संगठन नहीं है। इसके अलावा कोई डीडी प्रविष्टि नहीं मिली है जो यह दिखा सकती है कि जांच अधिकारी उनके द्वारा बताए गए किसी भी स्थान पर गया था।
तंवर की ओर से पेश वकील ने तर्क रखा कि उनके मुवक्किल को इस मामले में झूठा फंसाया गया और गिरफ्तारी के बाद उन्हें थर्ड डिग्री टॉर्चर किया गया जिसके कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उन्होंने कहा कि पुलिस हिरासत में उनकी हत्या की संभावना है। अदालत ने सभी तथ्यों को देखने के बाद आरोपी की जमानत 50 हजार रुपये के निजी मुचलके व एक अन्य जमानत राशि पर स्वीकार कर ली।