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सावधान! एम्स, सफदरजंग, आरएमएल में भी लुट रहे मरीज, कई डॉक्टर पेशे को कर रहे बदनाम

Wed, 21 Mar 2018 03:15 PM IST
परीक्षित निर्भय/अमर उजाला, नई दिल्ली
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हड्डी रोग से जुड़े मरीजों के इम्प्लांट पर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। मनमाने दाम वसूलने पर रोक के बावजूद सरकारी अस्पतालों में भी मरीजों को महंगे इम्प्लांट लगाए जा रहे हैं। इसके बदले डॉक्टरों को इम्प्लांट निर्माता कंपनी की ओर से मोटा कमीशन दिया जाता है।

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स्वास्थ्य मंत्रालय को मिली चालीस शिकायतों से डॉक्टरों के इस कारनामे का पता चला है। देश के प्रतिष्ठित एम्स, आरएमएल और सफदरजंग लेडी हार्डिंग आदि के कई केस इसमें शामिल हैं।

एक ताजा रिपोर्ट में इस गोरखधंधे का खुलासा हुआ है। पिछले वर्ष एनपीपीए ने घुटना प्रत्यारोपण की कीमत की सीमा 54 हजार रुपये से 1.14 लाख रुपये के बीच तय की थी।
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पहले इम्प्लांट के लिए मरीजों को 1.58 लाख से 2.50 लाख तक देेने पड़ते थे। इससे सर्जरी की मौजूदा लागत में करीब 70 प्रतिशत तक की कमी आने का दावा किया गया था, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा हुआ नहीं। डॉक्टर मरीजों को गुणवत्ता का हवाला देकर महंगे प्रत्यारोपण कराने की ही सलाह देते हैं।

डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल (आरएमएल) के एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने बताया कि उनके अस्पताल में भी कई डॉक्टर सस्ते इम्प्लांट की जगह 1.20 लाख रुपये तक की सर्जरी करते हैं। डॉक्टर मरीज और उसके परिजनों से पर्ची पर मंजूरी भी ले लेते हैं, ताकि उनके खिलाफ कोई कुछ न कर सके। वह खुद दो बार मंत्रालय को लिखित शिकायत दे चुके हैं।

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90 फीसदी अस्पतालों में चल रहा लूटपाट का खेल

rml hospital
एक बड़े अस्पताल के वरिष्ठ ऑर्थो डॉक्टर ने बताया कि घुटना और कूल्हे के प्रत्यारोपण में सबसे ज्यादा गोलमाल हो रहा है। रोक के बाद कुछ हद तक कमी जरूरी आई है, फिर भी दिल्ली के 90 फीसदी सरकारी और निजी अस्पतालों में मरीजों को लूटने का खेल चल रहा है। 

अस्पतालों में घूमते हैं कंपनियों के दलाल
ऐसी कंपनियों के दलाल खुलेआम सरकारी अस्पतालों में घूमते हैं। सफदरजंग से लेकर आरएमएल तक हर जगह ये लोग डॉक्टरों के केबिन के बाहर खड़े दिखाई दे जाते हैं। बताया जा रहा है कि कई डॉक्टर शिक्षण विभाग में दलालों को बुलाकर मिलते हैं, ताकि उन पर किसी की नजर न पड़ सके।

सब मालूम, पर नहीं हो रही कार्रवाई
मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि इस बारे में सरकार को जानकारी है, लेकिन हर बार जांच के बाद मामला रफादफा हो जाता है। इसके पीछे मरीजों के पास सबूतों का अभाव होना बताया गया है। जो डॉक्टर घपलेबाजी करता है वह कागजों में उतनी ही सफाई से बच जाता है। 
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