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Delhi : सुनवाई से बचना दिल्ली जल बोर्ड को पड़ा भारी, एनजीटी ने लगाया 50 हजार का जुर्माना

Thu, 10 Jul 2025 06:29 AM IST
दुष्यंत शर्मा नितिन राजपूत, नई दिल्ली

सार

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने डीजेबी पर 50,000 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही, आदेश दिया कि बोर्ड एक सप्ताह के अंदर जुर्माना एनजीटी बार एसोसिएशन के सचिव के पास जमा करेगा।    
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एनजीटी - फोटो : संवाद
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विस्तार
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नई दिल्ली के होटलों की ओर से अवैध रूप से भूजल निकालने के मामले में दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) को सुनवाई से बचना भारी पड़ा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने डीजेबी पर 50,000 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही, आदेश दिया कि बोर्ड एक सप्ताह के अंदर जुर्माना एनजीटी बार एसोसिएशन के सचिव के पास जमा करेगा।    

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एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि एनजीटी बार एसोसिएशन इस जुर्माना राशि का उपयोग दो महीने के अंदर बार रूम में रखने के लिए पर्यावरण संरक्षण से संबंधित पुस्तकें खरीदने के लिए करेगा। यही नहीं, इसकी रसीद एनजीटी के महापंजीयक के पास जमा की जाएगी। पीठ में विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए सेंथिल वेल भी शामिल रहे। मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी। 

अदालत ने यह सख्त लहजा अपने पिछले आदेश की अवहेलना के लिए अपनाया है। दरअसल, 28 फरवरी, 2024 को मामले में प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया था। ऐसे में मामले की सुनवाई बार-बार टलती रही और प्रतिवादियों को समय दिया गया। ऐसे में आवेदक शैलेश सिंह ने नया आवेदन दायर कर दिया, जो एनजीटी के पिछले आदेश के अनुपालन से जुड़ा है। 
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वहीं, 26 मार्च, 2025 को सुनवाई के दौरान डीजेबी ने टालने की मांग करते हुए  कहा कि उनके वकील किसी कारणवश मौजूद नहीं हो सकते। दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सुनवाई 7 जुलाई तक के लिए टाल दी।

डीजेबी बार-बार वकील नहीं होने का बनाता रहा बहाना
आवेदक ने अदालत से गुहार लगाते हुए एक नई याचिका दायर की। इसमें उन्होंने अदालत से निवेदन किया कि भूजल के अवैध दोहन के चलते पर्यावरणीय क्षति के जोखिम के आधार पर जल्दी सुनवाई की मांग की। ऐसे में 7 जुलाई को सुनवाई के दौरान डीजेबी ने एक बार फिर अदालत को बताया कि उनके वकील मौजूद नहीं है। साथ ही, उन्होंने सुनवाई टालने की मांग की। इस दौरान आवेदक के वकील ने दलील दी कि डीजेबी जानबूझकर स्थगन की मांग कर कार्यवाही में बाधा डाल रहा है।

उन्होंने दलील दी है कि इस आवेदन पर निर्णय लेने के लिए डीजेबी का मौजूद होना जरूरी है। सुनवाई के दौरान एनजीटी ने कहा कि उन्हें आवेदक के वकील के तर्क में दम नजर आता है। डीजेबी की तरफ से बार-बार इस आधार पर स्थगन कि वकील मौजूद नहीं हैं यह हकीकत नहीं लगता। ऐसे में इस अदालत को आवेदक का आरोप सही लग रहा है।

अधिकरण ने डीजेबी को फटकार लगाते हुए कहा कि  ऐसे मामले में लगभग सात वर्ष पूर्व पारित आदेश को मानने की मांग की गई है। डीजेबी का आचरण सराहनीय नहीं है। ऐसे में अगली सुनवाई की तारीख पर डीजेबी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) को अदालत के सामने पेश होना होगा।

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