- शोध में पाया गया कि दवाएं कम करने से मौत या गंभीर जटिलताओं का खतरा नहीं बढ़ा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। बुजुर्गों में कई बीमारियों के इलाज के लिए एक साथ कई दवाएं लेना आम बात है। अक्सर दिन की शुरुआत ही कई गोलियों के साथ होती है। इसमें ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल और दिल की बीमारी के लिए अलग-अलग दवाएं शामिल है। लेकिन, एक नए शोध में सामने आया है कि बहुत कमजोर और गंभीर रूप से बीमार बुजुर्गों के लिए इतनी सारी दवाएं हमेशा जरूरी नहीं होतीं। बीएमसी जेरियाट्रिक्स जर्नल में प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार, बहुत कमजोर और गंभीर रूप से बीमार बुजुर्गों के लिए हर दवा अनिवार्य नहीं होती। शोध के मुताबिक, डिमेंशिया या कम जीवन प्रत्याशा वाले मरीजों में डॉक्टरी सलाह से कुछ दवाएं कम करना पूरी तरह सुरक्षित है और इससे जोखिम नहीं बढ़ता।
राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. पुलिन गुप्ता ने बताया कि कई दवाएं भविष्य की बीमारियों को रोकने के लिए दी जाती हैं, लेकिन गंभीर मरीजों में इनका लाभ मिलने से पहले ही इनके दुष्प्रभाव दिखने लगते हैं। अधिक दवाओं के सेवन से चक्कर आना, कमजोरी, भ्रम और गिरने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे अक्सर अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आती है। डॉ. पुलिन के अनुसार, अनावश्यक रूप से स्टैटिन, अत्यधिक शुगर कंट्रोल करने वाली दवाएं और लंबे समय तक एसिडिटी की गोलियां लेना नुकसानदायक हो सकता है। देश में यह समस्या इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि मरीज अलग-अलग डॉक्टरों से इलाज लेते हैं, जिससे दवाओं के बीच रिएक्शन का खतरा रहता है। हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कोई भी दवा अचानक बंद न करें यह प्रक्रिया केवल डॉक्टर की निगरानी में धीरे-धीरे ही की जानी चाहिए। हर दवा की जरूरत को समझकर ही फैसला लेना जरूरी है।