समेकित बाल विकास परियोजना के तहत नजदीकी गांव भनकपुर और गढख़ेड़ा में चल रहे आंगनवाड़ी केंद्रों पर व्यवस्था परिवर्तन का कोई असर नजर नहीं आ रहा।
केंद्रों की हालत पशु बाड़ों से भी बदतर है। नौनिहालों के लिए न बैठने की और न खेलने की पर्याप्त व्यवस्था। कहीं राशन खत्म है तो कहीं खराब गेहूं का उपयोग हो रहा है। अधिकारी सब कुछ जानते हुए आंख-कान बंद किए बैठे है।
गांव गढख़ेड़ा के आंगनवाड़ी केंद्र संख्या-0724 में आज हैल्पर नदारद मिली। वर्कर रेखा ने बताया कि किसी कार्यवश अभी राशन बनाकर घर गई है।
यहां करीब एक दर्जन बच्चों के लिए आज दलिया बनाया गया था जबकि रेसिपी अनुसार आज गुलगुले देने का दिन था। बताया कि तेल, चावल, मुरमुरे, मूंगफली, सोयाबड़ी खत्म हो चुके हैं। कब आयेंगे, कोई पता नहीं। रजिस्टर में बच्चों की हाजिरी राशन वितरण के समय ही भरी जाती है।
केंद्र के बाहर कोई नामपट्टी नहीं। न केंद्र में बिजली की व्यवस्था। बच्चों के खेलने के लिये भी पर्याप्त जगह नहीं। गैस की व्यवस्था हैल्पर ने अपने स्तर पर कर रखी है। ईंधन की राशि मिले अर्सा हो चुका है। इसीतरह गांव भनकपुर में आंगनवाड़ी केंद्र जर्जर चौपाल पर संचालित होती है।
6 साल की आयु तक के जिन बच्चों को छोटे से कमरे में बैठाया जाता है, उसी को स्टोर और किचन के रूप में प्रयोग किया जाता है। बोरी में रखा गेहूं न केवल चूहों के लिये खुराक बन गया है बल्कि काला भी पड़ चुका है। इसी गेहूं को दलिया के रूप में बच्चों को आहार के रूप में दिया जाता है।
केंद्र की दीवारों में पड़ी दरारें भवन के असुरक्षित होने की गवाह हैं। ऊपर टीन की छत, जो सर्दियों में ठंडी और गर्मियों में गर्म। न खेल का सामान और न खेलने के लिए स्थान। ग्रामीण हरिदत्त, योगेश का कहना है कि आंगनवाड़ी में आमतौर पर सामान खत्म ही रहता है। इसलिए दलिया और चना आदि बांटकर काम चलाया जाता है। सामान नहीं मिलने के कारण बच्चे भी आंगनवाड़ी केंद्र नहीं जाते।