बेशरम जिस घर विच ठेड़े जिया लाल हो गए, अपणे पिओ दे कातिल दा प्रणया ओ दलाल हो गए। दुजेया ने घर ने झगड़े रावण ना छेड़ तू, पहले अपणे निमेड़ तू। यह भाषा आपको पंजाबी सी लग सकती है, लेकिन यह पंजाबी भाषा नहीं है।
यह पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के बन्नू जिले की बन्नूवाली भाषा है। सात अक्तूबर को शहर में जागृति रामलीला कमेटी द्वारा होने वाले रामलीला मंचन के रावण अंगद संवाद में यह भाषा आपको सुनने में मिलेगी। शहर में तीसरी बार बन्नूवाली भाषा में रामलीला का मंचन होगा।
पहले सीता स्वयंवर का मंचन इस भाषा में किया गया था। बताया जा रहा है कि बन्नूवाली भाषा में रामलीला मंचन देखने बड़ी संख्या में लोग उपस्थित होते हैं। वर्ष 1947 में भारत पाकिस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान के बन्नू जिले की भाषा फरीदाबाद एवं दिल्ली तक पहुंच गई। बड़ी संख्या में लोगों ने फरीदाबाद को अपना निवास स्थान बनाया था।
अपना सब कुछ छोड़कर वह यहां पर आ गए, लेकिन वह अपनी भाषा को आज तक जिंदा रखे हुए हैं। वह रामलीला के माध्यम से बन्नूवाली जुबां के बारे में लोगों को बताते हैं।
रामलीला कमेटी से जुड़े ओमप्रकाश कहते हैं कि रामलीला के संवाद लोगों को जोड़ने का काम करते हैं। रामलीला एक ऐसा मंच है जहां से सामाजिक सद्भाव, हिंदू मुस्लिम एकता एवं भाईचारे का संदेश दिया जाता है।
कमेटी के योगेश भाटिया ने बताया कि पाकिस्तान के खैबर पख्तून ख्वाह प्रांत का बन्नू जिला तो बंटवारे के दौरान छोड़ दिया। लेकिन वर्तमान एवं आने वाली पीढ़ी को उस भाषा के बारे में बताना चाहते हैं। उस भाषा को खोने नहीं देना चाहते हैं। बन्नूवाली जुबां हम सब लोगों के बीच अभी जिंदा है। रामलीला मंचन के माध्यम से आमजन इस भाषा से रूबरू होता है।