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अनाज मंडी: मजदूरों को रोजगार, मालिकों को व्यापार की चिंता और नेताजी की अलग है परेशानी

Thu, 12 Dec 2019 11:17 AM IST
पूजा त्रिपाठी नवनीत शरण, अमर उजाला, नई दिल्ली
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अनाज मंडी अग्निकांड - फोटो : अमर उजाला
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अनाज मंडी अग्निकांड में 43 लोगों की जान चली गई और इस पर राजनीति भी खूब चल रही है। अब इलाके में अवैध रूप से चल रही फैक्टरियों पर सीलिंग की तलवार लटक गई है। बिजली कंपनियां भी सख्ती दिखा रही हैं और कमर्शियल की जगह इंडस्ट्रियल मीटर के माध्यम से ही बिजली आपूर्ति देने की नीति तैयार कर रही हैं।

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प्रशासन का दबाव भी अवैध रूप से फैक्टरी चलाने वालों पर शिकंजा कसने का है। हालांकि हर वर्ग की चिंता अलग है। मजदूर अपने रोजगार को लेकर परेशान हैं तो कारोबारी अपने उद्योग-धंधों के भविष्य के लिए।

उधर, नेताजी को चिंता सता रही है कि मजदूर पलायन करेंगे तो आगामी विधानसभा चुनाव में न तो झंडा ढोने वाले मिलेंगे और न ही पदयात्रा व जनसभा-रैली में भीड़ बढ़ाने वाले। 
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मजदूरों को रोजगार छिनने का डर
पूर्वांचल से दिल्ली में काम करने आए मजदूरों की चिंता यह है कि अब उनका रोजगार छिन जाएगा। अवैध रूप से चल रहे उद्योग प्रशासन के दबाव में बंद हो गए हैं। गांधी नगर में काम करने वाले एक मजदूर ने बताया कि फैक्टरी मालिक व ठेकेदार ने काम पर नहीं आने और गांव वापस जाने को कहा है। जिस ठेकेदार के माध्यम से वह गांव से दिल्ली पहुंचा था, वह भी इन दिनों संपर्क नहीं साध रहा है।

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अवैध उद्योगों में काम बंद

अवैध उद्योग चलाने वालों ने भी फिलहाल प्रशासन के दबाव में काम बंद कर दिया है। दबी जबान में वे यह स्वीकार कर रहे हैं कि अनाज मंडी अग्निकांड के बाद अवैध फैक्टरी चलाना मुश्किल है।

वहीं, सही तरीके से फैक्टरी चलाने के लिए उनके पास जमीन नहीं है। प्रशासन ने उन्हें चेतावनी दी है कि अवैध फैक्टरी में मजदूरों से काम कराते हैं तो कभी भी जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ सकता है। अवैध तरीके से फल-फूल रहे उद्योग-धंधों पर सीलिंग की तलवार लटक गई है।

नेताजी की अलग है परेशानी
नेताजी इस बात से परेशान हैं कि उनका झंडा आगामी विधानसभा चुनाव में कौन ढोएगा। राजनीतिक पार्टियां भी परेशान हैं। उन्हें डर सता रहा है कि फैक्टरियां बंद हुईं तो मजदूर यहां से पलायन कर जाएंगे। अभी वे बड़ी-बड़ी रैलियों के लिए वे ठेकेदारों से संपर्क साध मजदूर वर्ग को पैसा खर्च कर बुला लेते हैं। ऐसे में उनका वोट तो नहीं ही मिलेगा, साथ ही प्रचार-प्रसार, पदयात्रा और जनसभा में भीड़ जुटाना भी भारी पड़ेगा।
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