अस्पतालों के चक्कर लगाते मरीज अमूमन आपको हर अस्पताल परिसर में दिख जायेंगे। लेकिन कभी आपने सोचा है कि अस्पतालों के इंकार से दिल्ली की सड़कों पर दिन-भर एंबुलेंस भी मरीज को लेकर दौड़ती रहती है। अपवाद नहीं, दिल्ली में आम तौर पर यही आलम रहता है। अमर उजाला संवाददाता परीक्षित निर्भय ने जमीनी हकीकत जानने के लिये एक दिन एंबुलेंस के साथ बिताया। हालात चौंकाने वाले नजर आये। पेश है एक रिपोर्ट...
केस 1:
8 घंटे घूमती रही एंबुलेंस
शनिवार, सुबह 8 बजे, मोती नगर के आचार्य भिक्षु अस्पताल से एंबुलेंस चलने को तैयार थी। एंबुलेंस कर्मी जरूरी औपचारिकतायें पूरी करते हैं। करीब 9 बजे पहली कॉल मिलती है। मरीज को सांस संबंधी बीमारी थी। उसे महाराज अग्रसेन से आरएमएल रेफर किया गया था। आरएमएल पहुंचने पर बेड न होने से एंबुलेस एम्स भेज दी जाती है। दोपहर करीब 12 बजे एंबुलेंस एम्स पहुंची तो वहां भी उसे भर्ती नहीं किया गया। अब उसे सफदरजंग अस्पताल भेजा गया। सफदरजंग में 2 बजे तक मरीज एंबुलेंस में लेटा रहा और स्टाफ इमरजेंसी वार्ड में मरीज को भर्ती कराने की कोशिश करता रहा। शाम 3 बजे मरीज को एंबुलेंस से उतारा, लेकिन ड्यूटी यही खत्म नहीं हुई। मरीज को भर्ती करने में दो घंटे और लग गए। शाम 5 बजे एंबुलेंस और उसके स्टाफ को छुट्टी मिली।
केस 2:
सायरन देने के बाद भी नहीं देते रास्ता
महाराज अग्रसेन अस्पताल से एम्स और सफदरजंग तक जब एंबुलेंस मरीज को लेकर दौड़ रही थी, उस वक्त दिल्ली की सड़कों का ट्रैफिक बेपरवाह दिखा। एंबुलेंस का सायरन बजने के बावजूद सामने चल रहे वाहन रास्ता देने को तैयार नहीं दिखे। भारी ट्रैफिक के बीच तीन और चार पहिया वाहन रास्ता नहीं देना भी उचित नहीं समझ रहे थे। इससे करीब तीस मिनट तक आईएनए मोड़ पर सड़क पर खड़ी रही।
20 फीसदी मरीजों की हो जाती मौत
कर्मचारियों का कहना है कि जब ये अस्पताल पहुंचते हैं तो डॉक्टर पहले सुनवाई नहीं करते, कभी एमएलसी तो कभी कुछ मांगते रहते हैं। सारे कागज दे दो तो भी जरूरी नहींकि मरीज को तत्काल इलाज मिल ही जाए। कर्मचारी बताते हैं कि 20 फीसदी मरीज समय पर डॉक्टर की केयर न मिलने से ही दम तोड़ देते हैं।
हर दिन आती 600 कॉल, यूज 200 का भी नहीं
सेंट्रलाइज्ड एक्सीडेंट एंड ट्रामा सर्विसेज (कैट्स)के कर्मचारियों ने बताया कि हर दिन कंट्रोल रुम में करीब 600 तक कॉल आती हैं, लेकिन इनमें से 200 कॉल से ज्यादा नहीं ले पाते। इस समय करीब 265 एंबुलेंस हैं, लेकिन इनमें से 150 ही ठीक ठाक स्थिति में है। इनमें से भी हर दिन 10 से 20 एंबुलेंस ऐसी हैं जो या तो एक ही मरीज को लेकर घुमती हैं या कोई कमी के कारण बीच रास्ते में खराब खड़ी होती हैं।
अस्पतालों को मिली चेतावनी
गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाने और प्रसूति के बाद महिलाओं को वापस घर छोडने के लिए सरकार ने निशुल्क एंबुलेंस सेवा दे रखी है। लेकिन सरकारी अस्पताल इनकी राह में रोड़ा बने हैं। स्वास्थ्य विभाग ने फटकार लगाते हुए इमरजेंसी वार्ड में मौजूद सीएमओ को जिम्मेदारी दी है कि वे गर्भवती महिला या फिर प्रसूति के बाद महिला के लिए एंबुलेंस उपलब्घ कराएं।
कैट्स यूनियन के महासचिव अजित डबास कहते हैं कि मरीजों को कई बार घंटों एंबुलेंस में रहना पड़ता है और एंबुलेंस एक से दूसरे अस्पताल के चक्कर लगाती रहती है। कई बार इसकी शिकायत सरकार से की जा चुकी है।