लोकसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल (बादल गुट) का पंजाब में बेहतर प्रदर्शन नहीं होने का खामियाजा दिल्ली प्रदेश अकाली दल को उठाना पड़ सकता है।
उनकी प्रदेश भाजपा पर अब दबाव की नीति भी कारगर नहीं होगी। अमृतसर लोकसभा सीट जिताने में नाकामयाबी का भी अकालियों को राजधानी में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बीजेपी के दिग्गज नेता अरुण जेटली की हार का ये सबक अकालियों को मिलना उनकी पार्टी के लिए बड़ा झटका है।
कमजोर हो गए अकाली
विधानसभा चुनाव होने पर अब प्रदेश भाजपा को किसी अन्य पार्टी का दबाव नहीं झेलना पड़ेगा। आम तौर पर हर चुनाव में अकाली नेता एक दर्जन से अधिक विधानसभा सीट पर नजर गड़ाए रहते थे।
लोकसभा चुनाव में भी अकालियों ने सात में से एक लोकसभा सीट पाने के लिए जी तोड़ मेहनत की थी। अब अकालियों की स्थिति कमजोर दिख रही है।
अकालियों की कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर बीजेपी अब आने वाले चुनावों में उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखा सकती है।
जेटली के इशारे पर चलती है दिल्ली BJP!
भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि भाजपा-अकाली गठबंधन के तहत उन्हें तीन-चार विधानसभा सीट पर मिलकर चुनाव लड़ना पड़ता है, लेकिन इस बार ऐसा कोई दबाव काम नहीं आएगा।
विधानसभा चुनाव में उन्हें राजौरी गार्डन, शाहदरा, हरिनगर और कालकाजी विधानसभा सीट दी गई थी। इनमें से अकाली तीन सीट पर विजयी हुए और हरिनगर सीट हार गए थे।
यह भी संभव है कि उन्हें दो या तीन सीट ही चुनाव में दी जाएं। कई लोगों का मानना है कि दिल्ली की राजनीति में राज्यसभा नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली का सीधा हस्तक्षेप रहता है। लिहाजा, इस बार अकालियों की राह आसान नहीं होगी।