अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों ने मधुमेह से पीड़ित बुजुर्गों के उपचार के लिए एक नया मुकाम हासिल किया है। एम्स के जेरिएट्रिक विभाग के डॉक्टरों ने मधुमेह से ग्रस्त मरीजों को लेजर तकनीक से पीड़ा दूर करने की पुष्टि की है। डॉक्टरों ने इसे लेकर एक अध्ययन भी किया था, जिसमें करीब 40 बुजुर्ग मरीजों को शामिल किया गया था।
डॉक्टरों के अनुसार देश में मधुमेह ग्रस्त मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के अनुसार साल 2025 तक देश में मधुमेह के 70 मिलियन और 2030 में 80 मिलियन रोगी सामने आ सकते हैं। ऐसे में अनियंत्रित मधुमेह और इसकी वजह से पैरों में दर्द होने के मामले भी अत्यधिक मिल रहे हैं। बुजुर्ग मरीजों को इसी दर्द से बगैर किसी दवा और सर्जरी के राहत दिलाने के लिए एम्स के डॉक्टर लंबे समय से अध्ययन कर रहे थे। अब अध्ययन के बाद डॉक्टरों ने दावा किया है कि जो मरीज डायबेटिक पेरिफेरल न्यूरोपैथी रोग यानी अनियंत्रित मधुमेह के साथ पैरों में दर्द के शिकार हैं, उन्हें डीप टिश्यू लेजर तकनीकी (डीटीएलटी) के जरिए राहत दी जा सकती है।
एम्स के वरिष्ठ डॉ. प्रसून चटर्जी ने बताया कि अध्ययन अप्रैल 2016 से दिसंबर 2017 के बीच इलाज के लिए पहुंचे 40 बुजुर्गों पर किया गया। इन मरीजों को दो वर्गों में बांट कर एक वर्ग के मरीजों को डीप टिश्यू लेजर थेरेपी व दूसरे वर्ग के मरीजों को शैम लेजर थेरेपी (एसएलटी) दी गई। इस दौरान यह देखा गया कि 12 सप्ताह डीप टिश्यू लेजर थेरेपी देने पर मरीजों को पैरों के दर्द से राहत मिली। वहीं विभाग के डॉ. विजय गुर्जर ने बताया कि डीप टिश्यू लेजर थेरेपी के जरिए पैरों की मांसपेशियों पर लेजर लाइट थेरेपी दी जाती है। लेजर लाइन कोशिकाओं की माइक्रोकौंडिया में जाकर ऑक्सीडेटिव इंजरी को रोकती है। इस थेरेपी में लेजर लाइट का तरंगदैर्ध्य 600-1100 एनएम (नैनो मीटर) तक होता है। चूंकि इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं होता इसीलिए बुजुर्गों के लिए यह तकनीक फायदेमंद साबित होगी।
डॉ. चटर्जी ने यह भी बताया कि जिन बुजुर्ग मरीजों को अनियंत्रित मधुमेह की दिक्कत होती है, उनमें पहले से ही काफी तरह की परेशानियां देखने को मिलती हैं। इन परेशानियों के साथ साथ पैरों में दर्द होने के कारण उन्हें कई बार अतिरिक्त दवा का सेवन भी करना पड़ता है जोकि कहीं कहीं अतिरिक्त भार के रूप में ही देखा जाता है। कई बार तो मरीजों को पैरों में दर्द के साथ जलन की समस्या भी होती है। इस स्थिति में ज्यादातर मामलों में दवाएं भी बेअसर ही रहती हैं। इसीलिए लंबे समय से इसकी वैकल्पिक चिकित्सा को लेकर एम्स के डॉक्टरों की टीम काम कर रही थी। उन्होंने इस अध्ययन को बुजुर्गों की चिकित्सा के मामले में एक मील का पत्थर बताया है।