एम्स ने अनुवांशिक बीमारी से पीड़ित एक रिक्शा चालक के बेटे को फ्री इलाज देने से मना कर दिया है।
अस्पताल ने कहा है कि उसे नॉन प्लान खर्च के लिए जितनी धनराशि मिलती है उसमें दवा, पट्टी और साफ-सफाई मुश्किल से हो पाती है।
हाईकोर्ट को उक्त जानकारी देते हुए एम्स ने कहा कि फिलहाल अस्पताल में 21 बच्चों का इलाज चल रहा है और जिनका खर्च एनजीओ व कंपनियां उठा रही हैं।
न्यायमूर्ति वीके जैन, एक रिक्शा चालक की याचिका पर सुनवाई कर रहे है। चार बच्चों को खोने वाले याची ने अपने पांचवें पुत्र को इस बीमारी से बचाने के लिए हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी।
याची ने आरोप लगाया कि एम्स में उसके बच्चे को निःशुल्क इलाज नहीं मिल रहा और गरीब होने के नाते वह खर्च उठाने में असमर्थ है। एम्स ने अपने जवाब में कहा कि अस्पताल में 21 ऐसी बीमारी से पीड़ित बच्चों का इलाज चल रहा है।
इनमें से 11 बच्चों के इलाज का खर्च इंटरनेशनल सोसाइटी उठा रही हैं। वहीं, पांच बच्चों का खर्च एक अन्य संस्था उठा रही है। इसके अलावा छह अन्य बच्चों का खर्च अभिभावकों की कंपनियां वहन कर रही हैं।
वहीं दिल्ली सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि वर्तमान में कॉरपोरेट जगत की सामाजिक जिम्मेदारी फंड के रूप में हिस्सेदारी मात्र दो प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट जगत को हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कहा जाना चाहिए ताकि इस प्रकार के बच्चों का इलाज हो सके।
अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा वे इस मुद्दे पर विचार करेंगे। याची सिराजुद्दीन के अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने तर्क रखा था कि उनके मुवक्किल के बच्चे को गौचर नामक अनुवांशिक बीमारी है।
इसी बीमारी की वजह से उनके मुवक्किल के चार बच्चों की मौत हो चुकी है। उनके मुवक्किल ने बेटे को चिकित्सा के लिए एम्स में भर्ती करवाया लेकिन अस्पताल ने फ्री में इलाज करने से इनकार कर दिया था।