नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के 22 सप्ताह से अधिक के भ्रूण का गर्भपात कर दिया गया है क्योंकि इसे रखना पीड़िता के शारीरिक व मानसिक रूप से खतरनाक था। यह जानकारी एम्स ने सोमवार को हाईकोर्ट को दी। चौदह वर्षीय पीड़िता ने याचिका दायर कर 22 सप्ताह से अधिक के भ्रूण का गर्भपात करने की अनुमति मांगी थी।
न्यायमूर्ति नजमी वजीरी की पीठ के समक्ष एम्स प्रशासन ने कहा कि गर्भपात करने के बाद भ्रूण को डीएनए जांच के लिए सुरक्षित रख लिया गया है। यह जानकारी सामने आने के बाद हाईकोर्ट ने इस याचिका का निबटारा कर दिया है। हाईकोर्ट ने एम्स को मेडिकल बोर्ड बनाने और 17 जून तक रिपोर्ट पेश करने का निर्देश 14 जून को दिया था।
कोर्ट ने कहा था कि इस संबंध में शीघ्र निर्णय लिया जाए क्योंकि प्रत्येक दिन की देरी के साथ गर्भपात करने पर पीड़िता की जान को खतरा बढ़ रहा है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या भ्रूण को जिंदा निकाला जा सकता है।
याचिका के मुताबिक दो जून 2019 को पीड़िता की मां को पता चला कि उसकी बेटी से दुष्कर्म किया गया है और वह गर्भवती है। पीड़िता की मां ने उसी दिन एफआईआर करवाई।
इसके बाद हुई मेडिकल जांच में आठ जून को पता चला कि पीड़िता को 22 सप्ताह का गर्भ है। पीड़िता की मां ने इसके बाद बाल कल्याण आयोग से संपर्क कर मदद की गुहार लगाई थी।
आयोग ने गर्भपात कराने के लिए हाईकोर्ट की अनुमति लेने की सलाह दी थी। देश में मौजूदा कानून के मुताबिक मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी अधिनियम 1971 के मुताबिक केवल 20 सप्ताह से अधिक के गर्भ का गर्भपात नहीं करवाया जा सकता।