सुप्रीम कोर्ट की ओर से समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के फैसले के बाद जहां देश के समलैंगिक वर्ग में खुशी का माहौल है। वहीं राजधानी दिल्ली के अस्पतालों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है। दावा किया जा रहा है कि अब अस्पतालों में लिंग परिवर्तन कराने के लिए होने वाले ऑपरेशनों की संख्या में कमी देखने को मिलेगी, क्योंकि दिल्ली के किसी न किसी अस्पताल में औसतन प्रति माह लिंग परिवर्तन के लिए एक सर्जरी होती है।
समाज के डर और अन्य वजहों के चलते दिल्ली के सरकारी अस्पतालों तक में दक्षिणी राज्यों तक के लोग आकर सर्जरी कराते हैं। इसके चलते कई अस्पतालों में लिंग परिवर्तन के लिए साल भर तक की वेटिंग भी देखने को मिल रही है। दिल्ली सरकार के सबसे बड़े अस्पताल एलएनजेपी में 12 लोग लिंग परिवर्तन के लिए वेटिंग में है। चूंकि इस अस्पताल में कैंसर मरीजों की संख्या ज्यादा है और उन्हें तत्काल चिकित्सा देना प्राथमिकता भी है। विशेषज्ञों की मानें तो अभी तक लिंग परिवर्तन कराने वाले भी अपनी पहचान सावर्जनिक नहीं होने देना चाहते, ऐसे में यह आंकड़ा और अधिक हो सकता है।
खुलकर अपनी बीमारी पर चर्चा कर सकेंगे
एम्स के एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है कि हर इंसान को अपना जीवन जीने का अधिकार है। चूंकि सरकारी अस्पतालों में अक्सर मरीजों का तांता लगा रहता है। इसके कारण लोग दूसरों से डर कर डॉक्टरों के पास तक नहीं पहुंचते। अब कम से कम ये लोग अस्पतालों में आकर डॉक्टरों के आगे खुलकर अपनी बीमारी पर चर्चा कर सकेंगे। उन्होंने बताया कि एम्स में भी लिंग परिवर्तन के केस आते हैं। हालांकि इसके लिए पूरी कागजी कार्रवाईकी जाती है। परिजनों से मंजूरी लेने के बाद ही ऑपरेशन किया जाता है।
समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से मुक्त करना अच्छा फैसला है। इससे अस्पतालों में आने वाल लिंग परिवर्तन संबंधी केसों में कमी देखने को मिल सकती है। कुछ ही माह पहले राजस्थान से एक केस आया था। इससे जाहिर है कि दिल्ली के अस्पतालों में बाहरी राज्यों से भी लोग लिंग परिवर्तन करवाने पहुंचते हैं।
-डॉ. पीएस भंडारी, प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष, एलएनजेपी