इंजीनियरों ने बताया कि प्रति किलोमीटर पर कोर कटिंग होगी। इसमें यह पता लगाया जाएगा कि पुराना मैटेरियल नए निर्माण में कितना कारगर साबित होगा। इस आधार पर सबसे बेहतरीन मैटेरियल का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा उपयोग में लाया जाएगा।
अगर पुराने मैटेरियल की गुणवत्ता ठीक नहीं हुई तो प्रतिशत पहले से कम होता जाएगा। उन्होंने बताया कि रांची स्थित रिंग रोड समेत बंगलूरू में हॉट इन प्लेस तकनीक से काम हो चुका है। इसकी मदद से पुराना मैटेरियल उपयोग में लाया जा सकता है। दावा किया जा रहा है कि इस तकनीक से बनी सड़क सात वर्ष तक नहीं टूटेगी। इसके अलावा काम भी तेजी से किया जा सकेगा।
काम के दौरान कैरेज होगा बंद
काम शुरू होने के दौरान एक्सप्रेसवे के एक-एक कैरेज को बंद करना होगा। इसके लिए ट्रैफिक पुलिस की ओर से पहले ही सचेत कर दिया जाएगा। इस रूट पर यातायात का दबाव काफी अधिक होता है, लिहाजा यहां काम करना चुनौती साबित होगी।
31 करोड़ रुपये की होगी बचत
नई तकनीक से काम करने में प्राधिकरण को 31 करोड़ रुपये की बचत होगी। अगर पुरानी पद्धति से काम किया जाता तो इसकी लागत 92 करोड़ आती। जबकि, नई तकनीक से निर्माण में 61 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।
नोएडा-ग्रेनो एक्सप्रेसवे की रिसर्फेसिंग के लिए एजेंसी का चयन हो चुका है। इसकी डिजाइनिंग कराने के बाद 15 से 20 दिन में काम शुरू करा दिया जाएगा। छह माह में सड़क का निर्माण करा दिया जाएगा।-एसपी सिंह, सीनियर मैनेजर, वर्क सर्किल-10