जानकारी के अनुसार, दिल्ली में 24 हजार हेक्टेयर जमीन ऐसी है, जो लैंड पूलिंग के दायरे में आती है। इसमें ज्यादातर कृषि भूमि है, जिसका स्वामित्व किसानों के पास है। डीडीए ने शर्त रखी है कि जिस भी जगह के भूस्वामी इस पॉलिसी में शामिल होना चाहते हैं, उनके पास वहां की खाली पड़ी जमीन का कम से कम 70 फीसदी हिस्सा होना चाहिए, तभी डीडीए वहां इसके लिए मंजूरी देगा।
डीडीए को प्रति हेक्टेयर देना होगा शुल्क
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि डीडीए को प्रति हेक्टेयर एक से दो करोड़ रुपये का विकास शुल्क भी देना अनिवार्य होगा। अधिकारी बताते हैं कि लैंड पूलिंग के तहत जमीन में 40 एवं 60 का अनुपात रखा गया है। 60 फीसदी जमीन पर उसके स्वामियों द्वारा निर्माण कार्य कराया जाएगा। इसमें भी 53 फीसदी हिस्सा रिहायशी निर्माण, पांच फीसदी कमर्शियल और दो फीसदी संस्थागत निर्माण के लिए तय किया गया है। 40 फीसदी जमीन पर डीडीए सड़कों, पार्क, सामुदायिक भवन और सीवरेज लाइन जैसी सुविधाएं विकसित करेगा।
70 फीसदी जमीन एकत्रित करना चुनौती
सूत्रों की मानें तो डीडीए को फिलहाल इस पॉलिसी में लंबा वक्त लग सकता है। पॉलिसी के तहत 70 फीसदी जमीन एकत्रित करना और उसके बाद वहां बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने में समय लग सकता है। उक्त सारी सुविधाएं विकसित होने और निर्माण कार्य पूरा होने में कई साल लगने तय हैं।