सीएसई ने कहा है कि दिल्ली में मेट्रो इस्तेमाल करने के लिए आय का 14 फीसदी खर्च करना पड़ता है, जबकि हांगकांग में मेट्रो के लिए आय का खर्च 2.9 फीसदी है। पेरिस में यही खर्च 6.6 फीसदी है। बीजिंग में 5.3 फीसदी, सियोल में 5.2 फीसदी, शंघाई में 5.7 फीसदी, न्यूयॉर्क में 4.6 फीसदी और यहां तक कि लंदन में मेट्रो पर कुल आय का खर्च 13.5 फीसदी है।
ज्यादा किराये के बाद भी नहीं है सुविधा
किसी गंतव्य तक पहुंचने के लिए टिकट का पूरा पैसा देने के बाद बीच यात्रा में यदि कोई यात्री उतर जाता है और वह किसी दूसरे परिवहन से उसी गंतव्य तक पहुंचता है तो उसे दूसरे परिवहन को अलग से किराया अदा करना पड़ता है, जबकि दुनिया के कई शहरों में एकीकृत सार्वजनिक परिवहन नीति के कारण किसी यात्री को इंटरचेंज कर गंतव्य तक पहुंचने के लिए दोबारा पैसा नहीं अदा करना पड़ता है। ऐसे में क्या दिल्ली मेट्रो इस तरह की सुविधा यात्रियों को दे पाएगी।
सभी तरह के परिवहन की गुणवत्ता सुधरे
सीएसई ने अपने अध्ययन में पाया है कि कई अन्य अध्ययन रिपोर्ट इस बात पर मुहर लगाती हैं कि दिल्ली में प्रत्येक व्यक्ति को परिवहन पर अपनी आय का 10 से 15 फीसदी के बीच खर्च करना पड़ता है। यदि आय का 15 फीसदी न्यूनतम खर्च परिवहन पर लोगों को करना पड़े, तो दिल्ली की एक तिहाई आबादी बुनियादी परिवहन सेवा से वंचित हो जाएगी। सीएसई ने कहा है कि वह सिर्फ मेट्रो की बात नहीं कर रही, बल्कि सभी तरह के परिवहन की गुणवत्ता सुधारने और किराए को मुफीद रखने को लेकर बातचीत कर रही है, इस पर विचार किया जाना चाहिए