सपनों के शहर दिल्ली में टूटा दुखों का पहाड़
मोतीलाल नेहरू कॉलेज में द्वितीय वर्ष के छात्र नीरज को छात्रवृत्ति कार्यक्रम के तहत जम्मू से दिल्ली भेजा गया था। पिता दर्शन दास ने अपने बेटे को बेहतर भविष्य, कॉलेज की शिक्षा और पैरों पर खड़ा देखने के लिए कड़ा संघर्ष किया था। लेकिन 6 सितंबर को हुए इस हादसे ने सब कुछ बदल दिया। मलबे के नीचे दबने से हिप फ्रैक्चर, कमर, जांघों और पेट में गंभीर चोटों के कारण नीरज फिलहाल खुद खड़े होने में असमर्थ हैं।
'तू शेर है, तूने हार नहीं मानी'
आईसीयू के बाहर गलियारों में दिन-रात बिता रहे बुजुर्ग पिता अपने बेटे के माथे पर हाथ फेरते हुए उसे ढांढस बंधाते हैं और कहते हैं, "तू शेर है, शेर...।" पिता का कहना है कि मलबे के नीचे अंधेरे में घंटों गुजारना और सुरक्षित बाहर निकलना भारीौंसले का काम था। नीरज जब दुर्घटना के वक्त अपने दोस्तों के साथ दूसरी मंजिल पर था, तब इमारत ढह गई थी। मलबे में दबने के बाद उसने अपनी सूझबूझ से फोन की लाइव लोकेशन बाहर फेंकी थी, जिससे बचाव दल तक उसकी सही स्थिति पहुंच सकी और उसकी जान बच पाई।
पिता के सामने भविष्य और इलाज की बड़ी चिंता
नीरज की अब तक करीब छह सर्जरी हो चुकी हैं और अभी और ऑपरेशन होने बाकी हैं। बायां पैर पूरी तरह सुन्न है और केवल दाएं पैर में हल्की हलचल है। हालांकि दिल्ली सरकार की ओर से 5 लाख रुपये की आर्थिक मदद और अस्पताल में मुफ्त इलाज मिल रहा है, लेकिन एक सेवानिवृत्त सैनिक (जिन्हें 35,000 रुपये मासिक पेंशन मिलती है) के लिए आगे का सफर बहुत कठिन है। 2016 में निमोनिया से पत्नी की मौत के बाद चार बेटियों और एक इकलौते बेटे की जिम्मेदारी उठाने वाले दर्शन दास अब चिंतित हैं कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वे फिजियोथेरेपी, दवाइयों और उपकरणों का खर्च कैसे उठाएंगे।
सरकारी नौकरी की गुहार
पिता ने सरकार से गुहार लगाई है कि उनके बेटे को कोई नौकरी दी जाए ताकि भविष्य में उसे और परिवार को आर्थिक संबल मिल सके। हादसे के कारण नीरज की पढ़ाई भी रुक गई है। कॉलेज प्रशासन ने ऑनलाइन क्लास का विकल्प दिया है, लेकिन शारीरिक और मानसिक रूप से टूटे नीरज के लिए फिलहाल पढ़ाई पर ध्यान देना बेहद मुश्किल हो गया है। एक शांत, मिलनसार और फुटबॉल प्रेमी लड़का जो कभी अपने करियर को लेकर उत्साहित रहता था, आज बिस्तर पर जिंदगी की जंग लड़ रहा है।