हाईकोर्ट ने ऑनलाइन चैट ग्रुप पर बोलने की आजादी को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि व्हाट्स ऐप व दूसरी सोशल नेटवर्किंग सर्विसेज के चैट ग्रुप का एडमिन ग्रुप में पोस्ट की जाने वाली सामग्री के लिए जिम्मेदार नहीं है।
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सोशल मीडिया
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न्यायमूर्ति राजीव सहाय एंडलॉ ने कहा कि ग्रुप एडमिन दूसरे सदस्यों की पोस्ट पर लगाम नहीं लगा सकता। इस आधार पर ग्रुप एडमिन पर किसी दूसरे सदस्य की ओर से भेजी गई आपत्तिजनक सामग्री की वजह से मानहानि का दावा नहीं किया जा सकता।
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कोर्ट ने यह आदेश एक चैट ग्रुप प्रबंधक के खिलाफ दायर मानहानि के आरोप को खारिज करते हुए दिया है। न्यायमूर्ति सहाय ने कहा कि मैं ये समझने में असमर्थ हूं कि कैसे किसी ग्रुप के एडमिन पर उस ग्रुप में दूसरे सदस्यों की ओर से भेजी गई आपत्तिजनक सामग्री के लिए मानहानि का दावा ठोका जा सकता है। ये आरोप उसी तरह है, जैसे न्यूजप्रिंट बनाने वाले को उसमें छापी गई टिप्पणी के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए।
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Social Media
अनुमति का प्रावधान नहीं
अदालत ने कहा एडमिन से अनुमति लेकर कोई सामग्री पोस्ट नहीं की जाती। ग्रुप में कुछ भी पोस्ट होने से पहले एडमिन से उसकी अनुमति लेने का कोई प्रावधान नहीं है। एडमिन मात्र सदस्यों को सलाह दे सकता है कि वे ग्रुप में कोई भी आपत्तिजनक सामग्री न डाले। कोर्ट ने कहा एडमिन सिर्फ एक ऑनलाइन चैट ग्रुप बनाता है। उसमें जोड़े जाने वाले सदस्यों का चयन करता है। जब कोई ग्रुप बनाया जाता है तो एडमिन ये उम्मीद नहीं करता कि उसको किसी दूसरे सदस्य की वजह से दोषी साबित किया जाएगा।
गुरुग्राम का मामला
अदालत ने चैट ग्रुप के एडमिन विशाल दुबे पर लगाए गए मानहानि के आरोप को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया है। दरअसल, गुरुग्राम जिले में एक हाउसिंग प्रोजेक्ट में तय अवधि में मकान न मिलने पर कुछ खरीदारों ने उक्त ग्रुप में प्रोजेक्ट के प्रबंधकों व निदेशकों के खिलाफ टिप्पणियां की थी। इन्हीं में से एक आशीष भल्ला ने मानहानि का मुकदमा दायर कर अपनी प्रतिष्ठा नष्ट करने का आरोप लगाया था।