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आरोपी ही दलित परिवार को लाया था राजनीति में

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सालभर पहले हुई घटना के बाद भले ही दलित और राजपूत परिवार एक-दूसरे को फूटी आंख न सुहा रहे हो, लेकिन कभी इन परिवारों में एक-दूसरे के प्रति अटूट विश्वास हुआ करता था।
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20 अक्तूबर की घटना के आरोपी बनाए गए लोगों ने ही दलित उम्मीदवार को सरपंच की गद्दी पर बिठाने में मदद की थी। दरअसल, 2001 में गांव के सरपंच का पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुआ था।

इसकी वजह से गांव में अनुसूचित जाति के कई उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतर आए थे। मुख्य रूप से पीड़ित जितेंद्र के दादा प्रभाती और रामप्रसाद के बीच टक्कर थी। वहीं, राजपूत परिवारों में सबसे मजबूत छिद्दा परिवार था।
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इसकी राजनीतिक बागडोर परिवार के सबसे छोटे बेटे बलवंत के हाथ थी। 20 अक्तूबर के सुनपेड़ कांड में बलवंत को ही मुख्य आरोपी बनाया गया है। बडे़ भाई बिशन ठाकुर कहते हैं कि बलवंत राजनीतिक समझ रखने वाला है।
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आरोपी ने घर-घर जाकर मांगे थे वोट

प्रभाती ने बलवंत से चुनाव में मदद मांगी थी, लेकिन छिद्दा परिवार रामप्रसाद के साथ खड़ा था। बलवंत प्रभाती को अपने समर्थन का वादा कर चुका था। काफी तर्क-वितर्क के बाद परिवार को बलवंत के सामने झुकना पड़ा।

छिद्दा परिवार ने प्रभाती का खुलकर समर्थन किया और परिवार की सभी 160 वोट प्रभाती को मिली। सरपंची के चुनाव में प्रभाती ने अपने प्रतिद्वंद्वी रामप्रसाद को 300 से ज्यादा वोटों से हराया था। बिशन बताते हैं कि बलवंत और प्रभाती में बेहतर तालमेल था।

राजनीति के मामले में वो हर पहलू पर बलवंत की सलाह लेता था। प्रसादी के सामने चुनाव में हारे रामप्रसाद भी मानते है कि बलवंत ने ही प्रभाती को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन 2014 की घटना के बाद दोनों परिवारों के बीच दरार पड़ गई।
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