ग्राउंड रिपोर्ट: 'भाई जी! एडवांस टिकट तो बुक करवाओ, कितना भी सामान हो, बस पर लाद लेंगे'; नीचे से छत तक भरा माल
Sat, 26 Sep 2026 02:16 PM IST
Sharukh Khan
सचिन कुमार/संदीप वर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
सार
ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेस-वे पर 23 सितंबर की देर रात चलती स्लीपर बस में लगी आग में हुई नौ यात्रियों की मौत के बाद भी संचालक नहीं चेत रहे हैं। बस की छतों पर सवारियों का सामान रख रहे हैं। यात्रियों ने दावा किया कि कई बसों में क्षमता से अधिक यात्री और सामान ले जाया जाता है।
‘भाई जी! एडवांस टिकट तो बुक करवाओ, कितना सामान भी लाद लेंगे...।’ यमुना एक्सप्रेसवे पर चलती बस में आग लगने से नौ यात्रियों की जिंदा जलकर मौत होने के बाद भी दिल्ली से चलने वाली निजी बसों के चालक और संचालक सतर्क नहीं दिख रहे हैं।
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शुक्रवार को भी बसों में यात्रियों को सामान के साथ बिठाने का भरोसा दिया जा रहा था। सामान चालक की सीट के पीछे रखा जा रहा था या गैलरी में, इसकी परवाह नहीं की जा रही थी। इससे यात्रियों के आने-जाने की जगह भी कम हो रही थी। वहीं, बसों की छत पर सामान लादना आम रहा।
मुनिरका, धौला कुआं, कश्मीरी गेट और आनंद विहार से दूसरे राज्यों के लिए चलने वाली निजी स्लीपर बसों में यात्रियों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इन बस पॉइंटों की पड़ताल में यात्रियों ने दावा किया कि कई बसों में क्षमता से अधिक यात्री और सामान ले जाया जाता है।
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कुछ बसों के अंदर फ्रिज और वॉशिंग मशीन जैसे बड़े सामान भी रखे जा रहे हैं। स्लीपर बसों में निकलने की कम जगह, आपातकालीन निकास की जानकारी का अभाव और पैनिक बटन की कार्यशीलता को लेकर भी सवाल हैं।
ड्राइवर की सीट के पीछे से छत तक सामान
मुनिरका और अन्य बस पॉइंटों पर यात्रियों के पहुंचने के बाद बसों में सामान रखने का सिलसिला शुरू हो जाता है। सामान्य बैग और सूटकेस के अलावा बड़े पैकेट और घरेलू सामान भी बसों में रखे जाते हैं। यात्रियों के मुताबिक, कई बार सामान इतना ज्यादा होता है कि बस के अंदर और बाहर उपलब्ध जगह का पूरा इस्तेमाल किया जाता है। कुछ बसों में फ्रिज और वॉशिंग मशीन जैसे बड़े सामान भी ले जाए जाते हैं।
मुनिरका से राजस्थान जा रहे यात्री मनोज ने बताया कि स्लीपर बस में पहले ही जगह कम होती है। ऐसे में अधिक सामान रखे जाने से परेशानी बढ़ जाती है। रात में कोई हादसा हो जाए तो यात्रियों को बाहर निकलने में दिक्कत हो सकती है। यात्रियों का कहना है कि बस संचालक अतिरिक्त पैसे लेकर ज्यादा सामान ले जाने की व्यवस्था कर देते हैं।
पैनिक बटन पर उठे सवाल
कश्मीरी गेट और आनंद विहार से चलने वाली स्लीपर बसों में सीटों और स्लीपर की बनावट को लेकर भी यात्रियों ने सवाल उठाए। उनके मुताबिक, कई बसों में सीटों और स्लीपर की संख्या अधिक होने से बीच में चलने की जगह कम बचती है। ऐसे में सामान भी रास्ते में रखा हो तो आपात स्थिति में बाहर निकलना और मुश्किल हो सकता है।
यात्री हर्ष ने बताया कि बस में नीचे वाली स्लीपर सीट आरामदायक है, लेकिन ऊपर की सीट पर परेशानी होती है। वहीं, कश्मीरी गेट पर बस का इंतजार कर रहे यात्री अभिषेक ने कहा कि उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि बस में पैनिक बटन लगा है या नहीं। अगर लगा है तो वह काम करता है या नहीं, इसकी भी कोई जानकारी नहीं दी जाती।
छत पर सामान, नीचे भी भरे बैग
आनंद विहार से उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों के लिए चलने वाली बसों में भी सामान की अधिकता दिखी। यात्रियों के मुताबिक, बसों के नीचे बने सामान रखने वाले हिस्से में बैग के साथ अन्य सामान भी रखा जाता है। वहीं, बस के अंदर उपलब्ध जगह का इस्तेमाल भी सामान रखने के लिए किया जाता है। कुछ बसों की छत पर भी सामान लादा जाता है।
मुनिरका में मिले यात्रियों ने कहा कि कुछ बसों में यात्रियों के साथ सामान की मात्रा भी अधिक होती है। ऐसे में सुरक्षा जांच का दायरा केवल यात्रियों की संख्या तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बस में कितना सामान ले जाया जा रहा है, उसे कहां रखा गया है और क्या आपात स्थिति में यात्रियों के बाहर निकलने के लिए पर्याप्त जगह है, इन पहलुओं की भी जांच जरूरी है।
बस सड़क पर दौड़ रही, जांच कागजों में ठहरी
दिल्ली में देश के अलग-अलग राज्यों के साथ नेपाल तक में पंजीकृत बड़ी संख्या में बसों की हर दिन आवाजाही रहती है, लेकिन अधिकारी यहां बसों में सुरक्षा मानकों को देखने की जहमत नहीं उठाते। जरूरी दस्तावेज देखकर ही वे अपनी जिम्मेदारी खत्म मान लेते हैं।
दिल्ली में दौड़ रही दूसरे राज्यों की बसों के रूट परमिट, पंजीकरण और प्रदूषण के केवल कागजी दस्तावेजों की जांच परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस करती है। पहले परी चौक से कश्मीरी गेट के बीच नाबालिग से दुष्कर्म और अब यमुना एक्सप्रेसवे पर चलती बस में आग लगने के हादसे के बाद बस यात्रियों की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
यमुना एक्सप्रेसवे बस हादसे से साफ है कि बस मालिक कमाई के लालच में बसों की लंबाई बढ़वाने और मानक 3.9 मीटर से अधिक ऊंचाई तक सामान रखने जैसे मानकों का उल्लंघन कर रहे हैं। इसका नतीजा आग लगने की घटनाओं और इमरजेंसी गेट नहीं खुल पाने के रूप में सामने आता है।
देशभर या कुछ राज्यों का परमिट लेकर चलने वाली ये बसें दिल्ली से यात्रियों को भरकर निकल जाती हैं। एनएच-9, यमुना एक्सप्रेसवे, एनएच-19, दिल्ली-जयपुर हाईवे और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से निकलने वाली बसों की जांच तो परिवहन विभाग करता है, लेकिन दूसरे राज्यों में पंजीकृत होने के कारण उन पर कार्रवाई की प्रक्रिया सीमित हो जाती है।
परिवहन के विभागीय सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में रोककर मानकों का पालन कराना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कश्मीरी गेट, आनंद विहार समेत अन्य बस डिपो से निकलने वाली निजी बसें अक्सर गलत करने के बाद भी बच निकलती हैं।
नियमों के अनुसार सामान समेत बस की ऊंचाई 3.9 मीटर तक होनी चाहिए। इससे अधिक होने पर बस सीज की जा सकती है। लंबाई, ऊंचाई या अन्य बदलाव मानकों के विपरीत मिलने पर एमवीआई मूल परमिट वाले संभागीय कार्यालय को परमिट निरस्त करने और पंजीकरण निलंबित करने की सिफारिश करता है। पर, जिस हिसाब से बसों पर सामान लादे जाते हैं वह खुद नियमों के पालन कराने की स्थिति को बयां कर देता है।