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डीयू में मोदी लहर, ABVP ने लगाया चौका

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दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी ने शानदार सफलता दर्ज की है। डूसू के चारों पद अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव को एबीवीपी ने जीत लिया है।
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इस जीत ने यह साबित कर दिया है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में एबीवीपी सबसे लोकप्रिय संगठन बन चुका है। यह सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले चुनाव में एबीवीपी को तीन सीटें ही मिली थी, जबकि इस बार चारो सीटों को जीत कर उसने नया इतिहास लिख दिया है।

एबीवीपी का मुख्य मुकाबला कांग्रेस की छात्र शाखा एनएसयूआई से था जिसे इस इलेक्शन में एक भी सीट नहीं मिली। अध्यक्ष पद पर एबीवीपी के मोहित नागर, उपाध्यक्ष का पद प्रवेश मलिक, सचिव का पद कनिका शेखावत और संयुक्त सचिव का पद आशुतोष माथुर ने 11 हजार मतों के मार्जिन से जीता है।
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एनएसयूआई से छीन ली इकलौती सीट

दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट इलेक्शन में एबीवीपी की ओर से अध्यक्ष पद पर जीते मोहित नागर को 20718 वोट मिले हैं जबकि, उनके निकटतम प्रतिद्वंदी एनएसयूआई के गौरव को कुल 19804 वोट मिले।

उपाध्यक्ष पद पर विजयी हुए प्रवेश ‌मलिक के पक्ष में कुल 21935 मत पड़े जबकि, एनएसयूआई की प्रत्याशी मोना को 14076 वोट मिले। इसी तरह एबीवीपी की आरे से सचिव पद पर जीतीं कनिका शेखावत को 18671 वोट मिले और इसी पद पर एनएसयूआई की पराजित उम्मीदवार अमित सिद्घू को 15649 मत मिले।

संयुक्त सचिव पद पर जहां एनएसयूआई कैंडीडेट अभिषेक को 12065 वोट मिला वहीं, इस पद पर एबवीपी के विजेता उम्मीदवार आशुतोष को कुल 23133 वोट मिले।

इस तरह संयुक्त सचिव पद पर आशुतोष की जीत का मार्जिन सबसे ज्यादा रहा जबकि उपाध्यक्ष बने प्रवेश मलिक को सबसे ज्यादा वोट मिले हैं।

गौरतलब है कि पिछले साल के चुनाव में कांग्रेस की छात्र शाखा एनएसयूआई ने सचिव का पद जीत कर अपनी प्रतिष्ठा बचा ली थी जबकि इस बार एबीवीपी ने यह पद भी एनएसयूआई से छीन लिया है।
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एफवाईयूपी बना सबसे बड़ा मुद्दा

इस चुनाव को दिल्ली विधान सभा का लिटमस टेस्ट माना जा रहा था। निश्चित ही यह परिणाम भाजपा का आत्मविश्वास बढ़ाने वाला है जबकि कांग्रेस के लिए यह चिंता का कारण बन सकता है।

डूसू के चुनाव में इस बार सबसे बड़ा मुद्दा एफवाईयूपी था। एबीवीपी शुरु से ही इस कोर्स के खिलाफ थी और इसे खत्म कराने के आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रही थी।

माना जाता है कि चार साल के कोर्स को शुरु कराने के पीछे डीयू के वीसी को कांग्रेस का समर्थन था। हालांकि केंद्र में एनडीए की सरकार बनते ही एफवाईयूपी को खत्म करने का आंदोलन तेजी से शुरु हुआ और अंततः यूनिवर्सिटी को अपना फैसला वापस लेना पड़ा।

उपाध्यक्ष के पद पर चुनी गईं ‌कनिका का कहना है कि एफवाईयूपी के अलावा बसों के पास और लड़कियों की सुरक्षा हमारा मुख्य मुद्दा था जिसे कैंपस ने पसंद किया और हमें अपना समर्थन दिया।
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