आम आदमी पार्टी (आप) ने बेशक दिल्ली विधानसभा चुनाव की ताल ठोंक दी है, लेकिन इसके लिए तैयार कई मोहरों को दिल्ली की खास सियासी समझ नहीं है। दूसरे राज्यों के करीब एक दर्जन नेताओं को पार्टी ने अहम जिम्मेदारी दे रखी है।
इनमें से ज्यादातर पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए थे। इससे पार्टी बनने के समय से दिल्ली में काम करने वाले कार्यकर्ता खुश नहीं हैं। कार्यकर्ताओं की आपसी बातचीत में बाहरी नेताओं को फुंके कारतूस के नाम से बुलाया जाता है।
सूत्रों की मानें तो पिछले विधानसभा चुनाव में अहम जिम्मेदारी निभाने वाले कई नेताओं को पीछे धकेल दिया गया है। प्रदेश इकाई के साथ पार्टी की दूसरी विंग में भी बाहरी नेताओं को खपाया गया है।
कार्यकर्ता पार्टी फैसलों से नहीं है खुश
बाहरी नेताओं में से कुछ को चुनावी रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी भी दी गई है। हालांकि नई टीम के कई चेहरे दिल्ली की सियासत से पूरी तरह वाकिफ हैं, लेकिन इसी क्रम में करीब एक दर्जन ऐसे नाम भी हैं, जो अपने इलाकों में कुछ खास नहीं कर सके थे। मसलन, मीरा सान्याल, आदर्श शास्त्री, सारिका चौधरी और गुलपनाग जैसे नेता लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारे थे, लेकिन दिल्ली में इन्हें चुनावी रणनीतिकार बनाया गया है।
पार्टी की इस कोशिश से दिल्ली के पुराने कार्यकर्ताओं के साथ कई नेता भी खुश नहीं हैं। नाम उजागर न करने की शर्त पर एक नेता ने कहा कि इनका ऐतराज इसी बात पर है कि बाहरी नेता जब अपने इलाके में खास नहीं कर सके तो दिल्ली चुनाव में इनसे ज्यादा उम्मीद करना कहां तक सही होगा।
वह भी तब, जब चुनावी लड़ाई कांटे की होने जा रही है। पार्टी को इस तरफ विचार करना चाहिए। दूसरी तरफ पार्टी का कोई नेता इस बारे में बात करने को तैयार नहीं है। सिर्फ इतना भर कहा गया कि पार्टी अपने हर नेता की योग्यता को इस्तेमाल कर रही है।