- अस्पताल बड़ा, सुविधाएं गायब: मरीजों के लिए बना दर्द का घर
रिजवान खान
नूंह।
जिले की 17 लाख आबादी के लिए 14 साल पहले उम्मीदों की किरण बनकर खड़ा हुआ 700 करोड़ रुपये की लागत से बना मेडिकल कॉलेज आज खुद ही बदहाली के आंसू बहा रहा है। साल 2012 में जब यह कॉलेज शुरू हुआ था, तब लोगों को भरोसा था कि अब इलाज के लिए दिल्ली, गुरुग्राम या जयपुर की दौड़ खत्म होगी। लेकिन हालात ऐसे हैं कि यहां आने वाला हर मरीज सुविधा के बजाय मजबूरी लेकर लौटता है, कभी दवा बाहर से खरीदनी पड़ती है तो कभी जांच के लिए निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है।
जब अस्पताल में ही टूट जाती है उम्मीद : यहां आने वाला हर मरीज एक उम्मीद लेकर आता है, लेकिन अक्सर निराश होकर लौटता है। अल्ट्रासाउंड जैसी जरूरी सुविधा तक उपलब्ध नहीं, कार्डियोलॉजिस्ट का नामोनिशान नहीं। एमआरआई की फिल्म खत्म, इको के रोल नहीं, ये सिर्फ तकनीकी कमी नहीं, बल्कि हर दिन टूटती उम्मीदों की कहानी है। गरीब आदमी, जो दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करता है, उसे हजारों रुपये खर्च कर बाहर जांच करवानी पड़ती है।
- रेफरल की राह में बुझती जिंदगियां : मेडिकल कॉलेज में इलाज के बजाय रेफर शब्द सबसे ज्यादा सुनाई देता है। लेकिन यह रेफरल कई बार मरीज के लिए मौत का रास्ता बन जाता है। अरावली कॉलोनी के 65 वर्षीय हाजी रफीक की मौत आज भी लोगों के दिलों में सवाल बनकर जिंदा है। सीने में दर्द उठा, अस्पताल पहुंचे, लेकिन कार्डियोलॉजिस्ट नहीं था। डॉक्टरों ने रेफर कर दिया... और रास्ते में ही जिंदगी हार गई। परिजन आज भी कहते हैं, अगर यहीं इलाज मिल जाता, तो शायद वो आज हमारे साथ होते।
- जब सीढ़ियां बन जाती हैं मजबूरी : अस्पताल की लिफ्टें अक्सर खराब रहती हैं। स्ट्रेचर पर लेटे मरीजों को सीढ़ियों से ऊपर ले जाना पड़ता है। हर कदम पर दर्द, हर मंजिल पर संघर्ष—यह नजारा किसी अस्पताल का नहीं, बल्कि सिस्टम की बेरुखी का आईना है।
- दवा के नाम पर खर्च, मरीज के हाथ खाली : हर महीने लाखों रुपये दवाओं पर खर्च होने के दावे किए जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि मरीजों को पर्ची थमा दी जाती है—“बाहर से ले आओ। गरीब परिवारों के लिए यह सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि आर्थिक टूटन का कारण बन जाता है।
- लापरवाही की हद पार : पानी की टंकी में बंदरों के शव मिलना सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सच्चाई है। सवाल यह है कि जहां पानी तक सुरक्षित नहीं, वहां मरीजों की जिंदगी कितनी सुरक्षित होगी?
- ट्रॉमा सेंटर: एक अधूरा सपना : हर साल हादसे होते हैं, लोग घायल होते हैं, लेकिन ट्रॉमा सेंटर आज भी सपना ही है। एक दशक से मांग हो रही है, लेकिन सुनवाई नहीं। हर देरी किसी की जिंदगी पर भारी पड़ती है।
मैंने हाल ही में जिले का कार्यभार संभाला हैं। लेकिन मेडिकल कॉलेज में अगर इस तरह की समस्या बनी हुई हैं तो हाई अथॉरिटी से संपर्क कर समाधान कराने की कोशिश की जाएगी। मेडिकल कॉलेज में सुविधा ना मिलने पर हार्ट की बीमारी से किसी व्यक्ति की जान गई है इसकी जानकारी मुझे नहीं है। विभाग से जानकारी लेकर आगामी प्रक्रिया अमल में लाई जाएगी।
ज्योति, अतिरिक्त उपायुक्त नूंह।
अस्पताल बना तो लगा था अब जिंदगी आसान होगी, लेकिन अब लगता है गरीब के लिए इलाज आज भी सपना ही है।
- आसिफ अली चंदेनी, समाजसेवी।
मेडिकल कॉलेज में इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले लोगों को दवाइयां तक पूरी नहीं मिलती जिसके चलते बाहर से दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं। हमारी मांग है कि पूरी दवाइयां मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध कराई जाएं।
- हाजी असगर टाईं, समाजसेवी।
मेडिकल कॉलेज की अव्यवस्थाओं को लेकर कई बार विधानसभा में आवाज उठाई लेकिन सरकार सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। हमारी मांग है कि जिलेवासियों की समस्या को देखते हुए तुरंत उचित प्रबंध करवाए जाएं।
- मामन खान इंजीनियर, विधायक फिरोजपुर झिरका।
सड़क हादसे में सीरियस मरीजों को तुरंत रेफर किया जाता है। जिससे अनगिनत लोगों की जान जा रही है। मेडिकल कॉलेज को रेफरल सेंटर ना बनाकर सारी सुविधाएं यहीं मुहैया कराई जाएं।
हाजी सोहराब खेड़ी, पूर्व इनेलो लोकसभा प्रत्याशी।