ज्योति सिंह
नई दिल्ली। जमीन के नीचे दबी प्राचीन नदी धाराएं भूजल के भंडारण और पुनर्भरण में मददगार हो सकती हैं। गंगा-यमुना दोआब में ऐसी ही एक प्राचीन नदी धारा यानी पैलियोचैनल की पहचान की गई है, जिसकी कुल लंबाई 200 किलोमीटर से अधिक बताई गई है। इस भूमिगत संरचना की मदद से भूजल पुनर्भरण की संभावनाओं को परखने के लिए 2.36 करोड़ रुपये की पायलट परियोजना को मंजूरी दी गई है।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल जवाब में यह जानकारी दी। मामले की सुनवाई 13 अक्तूबर को एनजीटी की प्रधान पीठ में अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद के समक्ष हुई। अधिकरण ने अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट रिकॉर्ड पर ली। अगली सुनवाई 5 फरवरी 2027 को होगी।
45 किमी की धारा का विस्तार 200 किमी से आगे तक मिला
एनएमसीजी के मुताबिक, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान ने कौशांबी से कानपुर तक भूमिगत प्राचीन नदी धाराओं और भूजल भंडारों का अध्ययन किया। इसमें हवाई सर्वेक्षण, भूभौतिकीय जांच और बोरहोल के जरिए सत्यापन किया गया। पहले पहचानी गई 45 किलोमीटर लंबी धारा को कानपुर की दिशा में लगभग 160 किलोमीटर आगे तक खोजा गया। इस तरह इसकी कुल मानचित्रित लंबाई 200 किलोमीटर से अधिक हो गई। अध्ययन में जमीन के नीचे 500 मीटर की गहराई तक तीन प्रमुख भूजल भंडार प्रणालियों की भी पहचान की गई।
160 संभावित स्थलों में से छह का चयन
रिपोर्ट के अनुसार, भूजल पुनर्भरण के लिए करीब 160 संभावित स्थलों की पहचान की गई। इनमें से छह स्थलों पर सरकारी जमीन की उपलब्धता का मौके पर सत्यापन हुआ है। इन्हीं जगहों पर प्रदर्शनात्मक परियोजना के तहत वैज्ञानिक तरीके से पुनर्भरण संरचनाएं बनाई जाएंगी। परियोजना के लिए 2.36 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। इसमें 1.65 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश के भूजल विभाग और 70.40 लाख रुपये सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान को आवंटित किए गए हैं। परियोजना 36 महीने में पूरी की जानी है।
भूजल स्तर और गुणवत्ता पर रहेगी नजर
परियोजना के तहत डिजिटल उपकरणों से भूजल स्तर की निगरानी की जाएगी। भूजल की गुणवत्ता भी जांची जाएगी। दो जलवैज्ञानिक चक्रों के दौरान यह आकलन होगा कि पुनर्भरण संरचनाओं से भूजल की उपलब्धता पर कितना असर पड़ा। हालांकि, भूजल स्तर में वास्तविक वृद्धि कितनी होगी, यह परियोजना के नतीजों के बाद ही स्पष्ट होगा।
2012 में शुरू हुई थी खोज
प्राचीन भूमिगत नदी मार्ग की तलाश वर्ष 2012 में शुरू हुई थी। शुरुआती सर्वेक्षण में प्रयागराज और कौशांबी के बीच करीब 45 किलोमीटर लंबे चैनल के संकेत मिले। इस दौरान हेलिबोर्न ट्रांजिएंट इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया। अध्ययन पर शोधपत्र दिसंबर 2021 में जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुआ। बाद में एनएमसीजी, केंद्रीय भूजल बोर्ड और सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान के सहयोग से सर्वेक्षण कानपुर तक बढ़ाया गया। वर्ष 2022 में तकनीकी रिपोर्ट सौंपी गई और प्राचीन नदी मार्ग की मानचित्रित लंबाई 200 किलोमीटर तक पहुंची। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह संरचना भूजल भंडारण और पुनर्भरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती है।