विलुप्तता के कगार पर पहुंच चुकी उडीसा की 500 वर्ष पुरानी फिलिग्री कला हस्तशिल्प के संगम के माध्यम से देश दुनिया तक पहुंच रही है। 31वें अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड मेले के माध्यम से फिलिग्री कला के बारे में पर्यटकों को बताया जा रहा है, ताकि इसे हस्तशिल्प के बाजार में जीवित रखा जा सके।
माना जा रहा है कि फिलिग्री हस्तशिल्प में काम करने वाले कारीगर कम मुनाफे के कारण अब अन्य कार्य में लग गए हैं। वहीं कार्य करने वाली लड़कियां पढ़ी लिखी होने के कारण इसमें रुचि नहीं ले रही हैं। तबरेज खान ने बताया कि पिछले एक दशक से इस कला पर कुछ कार्य नहीं हो पाया है।
कारीगरों की संख्या घटती जा रही है। विलुप्त हो रही कला के बारे में सरकार को भी जानकारी है, पर अब तक धरातल पर कोई खास कार्य नहीं हो सका है। फिलिग्री के तहत बनने वाले कुछ आभूषणों को महीन तार से बनाया जाता है।
यह है फिलिग्री कला
इस हस्तशिल्प में चांदी के जेवर, आभूषण बनते हैं। इसके लिए शुद्ध चांदी का इस्तेमाल कर इस पर महीन काम किया किया जाता है। यह प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है। सबसे अंत में झलाई का कार्य किया जाता है।
कला दुनिया में प्रसिद्ध
बताया जा रहा है कि मुगलों के समय यह कला उड़ीसा राज्य में पहुंची। तब से इस कला के प्रेमी एशिया, यूरोप के देशों में बड़ी संख्या में थे, लेकिन समय के साथ अच्छी आय नहीं होने पर यह कला कारीगर एवं हस्तशिल्पियों के हाथों से दूर होती गई। अब इसके लिए नए सिरे से प्रयास शुरू हो गए हैं। सरकार उड़ीसा में कला को बचाने के लिए प्रयास कर रही है।