भारत में हृदय की मुख्य धमनी के सिकुड़ने की गंभीर बीमारी एओर्टिक स्टेनोसिस का उपचार नहीं कराने से 50 फीसदी मरीजों की मौत हो जाती है। बड़ी बात यह है कि इनमें भी 40 फीसदी इसीलिए इलाज नहीं कराते क्योंकि वे वॉल्व रिप्लेसमेंट के लिए होने वाली ओपन सर्जरी का जोखिम नहीं उठाना चाहते। जबकि इसके लिए उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि बिना सर्जरी के भी वॉल्व रिप्लेसमेंट किया जा सकता है और प्रक्रिया के 4 से 5 दिन बाद मरीज घर वापस जा सकता है। यह कहना है विश्व का पहला कृत्रिम हार्ट वॉल्व और बिना सर्जरी के वॉल्व रिप्लेसमेंट थेरेपी टावर का आविष्कार करने वाले फ्रांस के डॉ. एलन क्रिबियर का।
शुक्रवार को ग्रेटर कैलाश स्थित एक होटल में हृदय रोग को लेकर सम्मेलन में डॉ. क्रिबियर ने बताया कि ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वॉल्व रिप्लेसमेंट प्रक्रिया वॉल्व रिप्लेसमेंट की ओपन चेस्ट सर्जरी का बेहतरीन विकल्प है। ओपन सर्जरी के दौरान होने वाले सारे जोखिम इस तकनीक में बिल्कुल नहीं होते हैं और प्रक्रिया के 4 से 5 दिन बाद मरीज को अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है।
वह जल्द ही वापस अपनी सामान्य दिनचर्या में भी लौट सकता है। जबकि ओपन चेस्ट सर्जरी के बाद मरीज को रिकवरी करने में छह महीने से एक साल तक का समय लग जाता है। इस प्रक्रिया में मरीज की जांघ से हृदय की ओर जा रही बड़ी नस में से कैथेटर के जरिये वॉल्व पहुंचाकर उसे खराब हुए वॉल्व से बदल दिया जाता है।
दुनिया भर के 65 देशों में 3.50 लाख से अधिक मरीजों को इस तकनीक से वॉल्व रिप्लेसमेंट कर बचाया जा चुका है। कार्यक्रम में फोर्टिस एस्कॉर्ट के कार्डियोलॉजी चेयरमैन डॉ. अशोक सेठ ने बताया कि हमारे देश में 70 वर्ष से अधिक की 5 से 10 फीसदी आबादी एओर्टिक स्टेनोसिस की गंभीर बीमारी से ग्रसित है। ऐसे मरीजों को डायबिटीज, बीपी, कमजोरी किडनी, खराब फेफड़ों से जुड़ी और भी समस्याएं होती हैं। इन मरीजों के लिए टावर तकनीक बेहद कारगर है।