साल 2016 में जारी राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे (एनएमएचएस) के अनुसार देश में मानसिक बीमारियों का प्रकोप 13.7 प्रतिशत है जबकि मानसिक बीमारियों के कारण आत्महत्या करने का खतरा 6.4 प्रतिशत है। दुनिया की करीब 18 फीसदी आबादी भारत में रहती है, लेकिन दुनिया में सर्वाधिक 28 फीसदी आत्महत्याओं के मामले सामने आ रहे हैं। भारत में आत्महत्या की दर प्रति एक लाख पर करीब 18 है। जोकि विश्व दर 10.7 से करीब 70 फीसदी ज्यादा है।
डिजिटल इंडिया का सहारा दे सकता है लाभ
इस अध्ययन में करीब 87 फीदी लोगों ने मोबाइल फोन, एप या फिर टेली मेडिसिन सुविधा के जरिए मानसिक रोगों के उपचार की मांग की है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर भविष्य में सरकार तकनीकी की दिशा में ऐसा करती है तो काफी हद तक मानसिक रोगों को लेकर बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
युवा डॉक्टरों के बीच आत्महत्या को रोकने के लिए आईएमए की पहल
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस को लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने युवा डॉक्टरों के बीच आत्महत्या के बढ़ते मामलों को लेकर युवा डॉक्टरों के लिए दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित किया। बुधवार को आईएमए के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ रवि वांखेडकर ने बताया कि सामान्य आबादी की तुलना में मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों की आत्महत्या दर बहुत अधिक है।
प्रति 1 लाख मेडिकोज पर 28-40 आत्महत्याओं का अनुमान लगाया गया है। विश्व स्तर पर मानसिक तनाव के कारण होने वाली आत्महत्याओं में हमारा देश 11.6 फीसदी योगदान करता है। 15 से 20 वर्ष के आयु वर्ग के किशोरों और युवाओं के बीच आत्महत्या मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण है।
केरल, कर्नाटक, तमिलनाडू, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और दिल्ली के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों के लिए कार्यशाला आयोजित की हैं। यही नहीं जल्द ही आईएमए डी फॉर डी नामक अभियान भी शुरू करने वाला है। जिसमें सभी राज्य के यूजी व पीजी मेडिकल विद्यार्थियों को निशुल्क हेल्पलाइन की सुविधा मिलेगी।