गंगा को निर्मल बनाने की मुहिम में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का सख्त रवैया कायम है। एनजीटी ने संबंधित मंत्रालयों और प्राधिकरणों से पूछा कि वो बतायें कि बीते 30 वर्षों में हजारों करोड़ रुपये फूंकने के बाद भी 2500 किमी लंबी गंगा का एक इंच भी क्या साफ है?
केंद्र से इतना पैसा राज्यों को मिला है बावजूद इसके गंगा बदहाल है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को फटकार लगाते हुए ग्रीन पैनल ने कहा कि राज्य अपनी जिम्मेदारी से भाग क्यों रहे हैं।
क्यों उन्हें छोटे से काम के लिये केंद्र से ही पैसा चाहिए? राज्य की अपनी कोई जिम्मेदारी है या नहीं। जबकि पानी, पर्यावरण जैसे विषय राज्य के हैं। जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को मामले की सुनवाई की।
गंगा की सफाई को लेकर आदेश दिया जायेगा
एनजीटी ने जल संसाधन मंत्रालय, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकार को फिर से स्पष्ट करते हुए कहा कि वह गोमुख से कानपुर तक गंगा की पहले चरण में सुनवाई करेंगे।
इस सुनवाई में सबसे पहले गोमुख से हरिद्वार क्षेत्र में गंगा की सफाई को लेकर आदेश दिया जायेगा। इसके बाद हरिद्वार से कानपुर तक गंगा को स्वच्छ बनाने को लेकर सुनवाई होगी।
सोमवार को उत्तराखंड सरकार एसटीपी और अवैध होटलों, आश्रमों की सूची, रिकॉर्ड और सरकार से स्पष्ट निर्देश लेकर ट्रिब्यूनल को बताये।
1985 से अब तक राज्यों को दिये 4000 करोड़ रुपये
एनजीटी में जल संसाधन मंत्रालय की ओर से पेश काउंसिल ने कहा कि 1985 से केंद्र की ओर से राज्यों को स्वच्छ गंगा के लिये 2014 तक करीब 4000 करोड़ रुपये दिये जा चुके हैं। गंगा एक्शन प्लान का पहला चरण 1985 में शुरू किया गया था।
गंगा के जल को निर्मल बनाने के लिये दूसरा चरण 1993 में लाया गया। इसके अलावा गंगा में प्रदूषण की रोकथाम के लिये 2009 में नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी (एनजीआरबीए) को स्थापित किया गया था।
एनजीआरबीए वर्ल्ड बैंक की स्कीम है। इसका मकसद गंगा में प्रदूषण की रोकथाम और नदी का सरंक्षण है। इस स्कीम में 70 फीसदी आर्थिक सहयोग केंद्र के जरिये होता है।
केंद्र और राज्य अपनी जिम्मेदारी टाल रहे हैं
बाकी 30 फीसदी राज्यों के जरिये होता है। इस पर ग्रीन बेंच ने कहा कि गंगा को साफ करना आपकी प्रमुख जिम्मेदारी में से एक है। आपका जवाब काफी देर से आया है।
इसलिये आपके पास अब बहुत कम समय है। ग्रीन पैनल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश बाद गंगा में प्रदूषण फैलाने वाले इंडस्ट्रियल यूनिट के खिलाफ राज्यों ने बीते कई वर्षों में क्या कदम उठाये हैं?
इस विषय पर केंद्र और राज्य एक दूसरे पर अपनी जिम्मेदारी टाल रहे हैं। आज तक धरातल पर कुछ नहीं उतरा।