भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस नीति का लोक निर्माण विभाग में बेशक कुछ असर दिखा हो, लेकिन समाज कल्याण विभाग में यह बेअसर रही। इसकी सबसे ताजा मिसाल उच्च न्यायालय का वह आदेश है, जिसमें उत्तराखंड सरकार से पूछा गया कि छात्रवृत्ति घोटाले में जिन पांच अधिकारियों कर्मचारियों को निलंबित किया गया, उनमें से कितनों के खिलाफ विभागीय स्तर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई अमल में लाई गई।
अदालत के इस निर्देश ने शासन स्तर पर बैठे उन अफसरों की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए, जिन्होंने विभागीय कार्रवाई के मामले में सुस्ती बरती और इस पूरे मामले में लीपापोती का प्रयास किया। कार्रवाई के मामले में पूछने पर विभाग के उच्चाधिकारियों के पास एक ही जवाब है कि मामला न्यायालय में हैं। सचिव समाज कल्याण एल फनै कहते हैं, यह मामला मेरे संज्ञान में है। लेकिन चूंकि यह कोर्ट का विषय है, इसलिए इस बारे में ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं। अलबत्ता नीति नियम सम्मत कार्रवाई विभाग करेगा।
सवाल छात्रवृत्ति घोटाले के आरोपियों पर अब तक विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई में देरी को लेकर है? घोटाले में जिन अधिकारियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए। जेल गए और उन्हें सस्पेंड कर दिया गया, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया क्यों नहीं शुरू की गई? जबकि प्रदेश सरकार का भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस संकल्प है और इसका असर मुख्यमंत्री के खुद के विभागों में दिखाई दिया है।
इसकी मिसाल लोक निर्माण विभाग है जहां टेंडर प्रक्रिया, निर्माण की गुणवत्ता में लापरवाही व अन्य अनियमितताओं को लेकर 22 इंजीनियरों को रिवर्ट होने की सजा मिली। लेकिन समाज कल्याण विभाग के तीन अधिकारियों को छात्रवृत्ति घोटाले की जांच में फंसने के दौरान पदोन्नति दे दी गई। इनमें एक अधिकारी संयुक्त निदेशक बने, दूसरे उपनिदेशक और तीसरे जनजातीय विभाग में उपनिदेशक पद पदोन्नत हुए। जबकि छात्रवृत्ति घोटाले की शिकायतें पिछले पांच सालों से सत्ता के गलियारों में गूंजती रही हैं।
कोर्ट के आदेश के बाद हरकत में शासन
उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद शासन स्तर पर छात्रवृत्ति घोटाले में आरोपी अफसरों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई में तेजी दिखने लगी है। मुख्य सचिव ओम प्रकाश के निर्देश पर सचिव समाज कल्याण एल फनै ने अधिकारियों को प्रक्रिया में तेजी लाने को कहा है।
आरोप पत्र जारी होंगे, जांच अधिकारी तैनात होगा
छात्रवृत्ति घोटाले में आरोपी अधिकारी को विभाग आरोप पत्र जारी करेगा। आरोप पत्र बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसके बाद जांच अधिकारी तैनात होगा, जो आरोप पत्र के जवाब की जांच करेगा। सूत्रों के मुताबिक, शासन को न्यायालय में चार हफ्ते में हलफनामे के साथ अनुशासनात्मक कार्रवाई के संबंध में जवाब दाखिल करना है।
सरकार नहीं कर रही अपने अंशदान की पूरी भरपाई
नई पेंशन योजना को लेकर प्रदेश सरकार ने अपने अंशदान में दस करोड़ रुपये नहीं जमा किए। इसके साथ ही सरकार ने नेशनल सिक्योरिटी डिपोजिटरी (एनएसडीएल) में भी 170 करोड़ रुपये नहीं डाले। इससे कर्मचारियों को रिटर्न कम मिलने की आशंका खुद महालेेखा परीक्षक उत्तराखंड ने जताई है।
कर्मचारी इस समय प्रदेश में पुरानी राष्ट्रीय योजना के समर्थन में लामबंद हैं। इनकी ओर से इसके लिए मंत्रियों का समर्थन भी लिया जा रहा है। कर्मचारियों का आरोप है कि नई पेंशन योजना से उन्हें नुकसान है। प्रदेश सरकार ने वर्ष 2005 में नई पेंशन योजना शुरू की थी। जिसमें कर्मचारियों से कहा था कि वे इस योजना में शामिल हों। इस समय करीब 70 हजार कर्मचारी इस योजना से जुड़े हैं।
इस बार सदन के पटल पर रखी गई कैग रिपोर्ट भी कर्मचारियों की आशंकाओं को सही साबित कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में 31 मार्च तक कर्मचारियों का पेंशन अंशदान में करीब 382 करोड़ रुपये जमा करना था। राज्य सरकार ने इसमें करीब 371 करोड़ रुपये जमा कराए गए। इस तरह से राज्य सरकार ने अपने अंशदान में दस करोड़ रुपये की कमी की।
इतना ही नहीं, कुल जमा 905 करोड़ रुपये में से केवल 746 करोड़ रुपये की एनएसडीएल को हस्तांतरित किए। इस तरह से सरकार ने 170 करोड़ रुपये कम हस्तांतरित किए। कैग का कहना है कि सरकार के ऊपर 170 करोड़ रुपये के ब्याज का भार तो पड़ा ही, साथ ही फंड का सही इस्तेमाल न होने से कर्मचारियों को भविष्य में मिलने वाले लाभों को लेकर भी अनिश्चय की स्थिति पैदा हो गई। कैग ने तो यहां तक कहा है कि इससे योजना के ही असफल होने की आशंका तक बन सकती है।