उत्तराखंड राज्य के लिए जिस तरह का जनांदोलन हुआ, ठीक वैसा ही राजधानी गैरसैंण के लिए भी खड़ा किया जा रहा है। इस बार आंदोलन की कमान पढ़े-लिखे नौजवानों के हाथों में है।
अपने आंदोलन को मजबूत करने के लिए जुनूनी युवा प्रदेश के हर हिस्से में पहुंच रहे हैं और लोगों का समर्थन जुटा रहे हैं। उन्हें पहाड़ी क्षेत्रों की उपेक्षा से नाराज और व्यथित राज्यवासियों का भरपूर समर्थन भी मिल रहा है। युवाओं के इस जनांदोलन को मजबूत करते हुए लोग प्रदेश के कई इलाकों में विरोध-प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी भी जाहिर कर रहे हैं। इसी मांग को लेकर गैरसैंण में भी पिछले लंबे समय से लगातार आंदोलन चल रहा है।
राज्य आंदोलनकारियों का सपना था कि पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ में ही होनी चाहिए, तभी इसका असल फायदा मिलेगा। गैरसैंण को राजधानी के तौर पर देखा गया, लेकिन 17 सालों में कोई सरकार निर्णय नहीं ले सकी। गैरसैंण राजधानी की मांग नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई। लेकिन अब पहली बार इस मांग पर एक गंभीर और मजबूत आंदोलन खड़ा होता दिख रहा है।
प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों के युवाओं ने इस आंदोलन को शुरू किया और अब आगे बढ़ा रहे हैं। मोहित डिमरी, प्रदीप सती, दीपक चमोली, भगवती प्रसाद, सत्यपाल नेगी, केपी ढौंडियाल, विनोद डिमरी, प्यार सिंह नेगी, पुरूषोत्तम चंद्रवाल, दीपक बेंजवाल, लक्ष्मण सिंह नेगी, नरेश भट्ट, शत्रुघ्न सिंह नेगी, रमेश बेंजवाल, कुलदीप राणा, राय सिंह रावत जैसे गैरराजनीतिक पृष्ठभूमि के युवाओं ने इस आंदोलन की शुरूआत की।
देहरादून, पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा में यह आंदोलन फैल चुका है, जो धीरे-धीरे नई ऊंचाइयों को छू रहा है। युवाओं ने जगह-जगह कैंडल मार्च, विरोध प्रदर्शन के साथ ही लोगों से गैरसैंण राजधानी के पक्ष में संकल्प पत्र भी भरवाए हैं। अगस्त्यमुनि और ऊखीमठ की बीडीसी बैठकों में गैरसैंण स्थायी राजधानी का प्रस्ताव पारित किया जा चुका है।
जनगीतों के साथ निकल रहे युवाओं के मशाल जुलूस को लोगों का अच्छा खासा समर्थन भी मिल रहा है। आंदोलन की कमान संभाल रहे मोहित डिमरी गैरसैंण राजधानी को पहाड़ के विकास के लिए जरूरी मानते हैं। मोहित कहते हैं कि देहरादून राजधानी के लिए अलग उत्तराखंड का सपना नहीं देखा गया था। सरकारों की उपेक्षा और सुविधाओं की कमी के चलते पहले ही पहाड़ से पलायन चरम पर है। पहाड़ खाली होते जा रहे हैं। अब राजनीतिक रूप से भी पहाड़ बेहद कमजोर हो गया है।
गैरसैंण को राजधानी बनाने के नाम पर सभी दल केवल राजनीति कर रहे हैं। राज्य गठन के 17 साल बाद भी हम स्थायी राजधानी पर फैसला नहीं ले पाए हैं। पर्वतीय जनपदों के लोग आज भी उपेक्षित और हाशिए पर हैं। पहाड़ी प्रदेश में मैदान केंद्रित योजनाएं बनाई जा रही हैं। पहाड़ की बातें केवल भाषणों में हो रही है। अब प्रदेश का युवा जाग गया है। हम जानते हैं कि अगर राजधानी गैरसैंण नहीं बनी तो अगले कुछ वर्षों में पहाड़ों का अस्तित्व पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
- मोहित डिमरी, आंदोलनकारी
इन वजहों से हो रही गैरसैंण को राजधानी बनाने की वकालत
मैदानी क्षेत्र के हरिद्वार, देहरादून, ऊधमसिंह नगर जिले में जनसंख्या घनत्व बढ़ता ही जा रहा है। हरिद्वार में प्रति वर्ग किमी में 817 लोग रह रहे हैं। जबकि उत्तरकाशी में यह आंकड़ा महज 41 और चमोली में 49 पर सिमटा हुुआ है। इससे राजनीति भी मैदानी क्षेत्र सिमट कर रह गई है। पहाड़ इस होड़ में पीछे छूटता जा रहा है। पलायन के चलते पहाड़ की राजनीतिक ताकत कमजोर होती जा रही है।
2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तराखंड के 16,793 गांवों में से 1053 गांव में अब एक भी आदमी नहीं है। जबकि 400 गांवों की आबादी दस से भी कम रह गई है। यह तो 2011 की जनगणना के आंकड़े हैं। हालिया स्थिति यह है कि अब उत्तराखंड के करीब तीन हजार गांव खाली हो चुके हैं। जबकि एक हजार गांव ऐसे हैं, जहां गिनती के लोग रह गए हैं। 88 फीसदी पहाड़ में 47 फीसदी लोग रहते हैं। जबकि 12 फीसदी मैदान में 53 फीसदी आबादी रहती है।
पहले पहाड़ में 40 विधानसभा सीटें थी। वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन के बाद पहाड़ से छह सीटें कम हो गई। अब पहाड़ में 34 विधानसभा सीटें ही रह गई हैं। जबकि परिसीमन के बाद मैदान में सीटें 30 से बढ़कर 36 हो गई हैं। अब 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन हुआ तो पहाड़ से कम से कम सात विधानसभा और सीटें कम हो जाएंगी। ऐसा हुआ तो पहाड़ में केवल 27 सीटें ही रह जाएंगी। दूसरी तरफ मैदान में सीटें बढ़कर 43 हो जाएंगी।
योजना आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के 58 प्रतिशत गांवों में अभी तक सड़क नहीं पहुंची है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि पहाड़ी क्षेत्र में सिर्फ 18 प्रतिशत जमीन पर ही सिंचाई के साधन हैं जबकि मैदान में 95 प्रतिशत जमीन सिंचित है।
...तो अंजाम तक पहुंचेगा आंदोलन
गैरसैंण राजधानी को लेकर चल रहा आंदोलन अंजाम तक पहुंचेगा या उसका हश्र भी उन सैकड़ों-हजारों आंदोलन की तरह होगा, जो बुलबुले की तरह उठते हैं और फिर बैठ जाते हैं। यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जब भी गैरसैंण में कुछ होता, हर बार इस तरह का एक आंदोलन खड़ा हो जाता है। विशेषकर किसी भी तरह के चुनाव से पहले गैरसैंण का राग जरूर अलापा जाता है। अब निकाय चुनाव से पहले एक बार फिर गैरसैंण के नाम पर आंदोलन हो रहा है तो संदेह होना स्वाभाविक है। हालांकि आंदोलन से जुड़े युवा खुद को पूरी तरह गैर राजनीतिक बता रहे हैं। उनका कहना है कि बिना किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के केवल गैरसैंण राजधानी और पहाड़ी प्रदेश की अवधारणा के लिए यह आंदोलन चल रहा है।