जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज ने कहा कि योग का शरीर से कोई संबंध नहीं है। योग तो मनुष्य के भीतर घटता है।
बीमारियों से योग को जोड़ना योग की अवमानना है। यह ऐसी धरोहर है जिसके माध्यम से मनुष्य अनंत परमात्मा में विलीन होता है। वही परम योग है।
शारदापीठाधीश्वर ने एक भेंट में अमर उजाला को बताया कि प्राणायाम और आसन योग को सुयोग की ओर बढ़ाने के पायदान हैं। इन दोनों के माध्यम से योग का मार्ग दिखाई पड़ता है। केवल इन्हें और पीटी को योग कहना उचित नहीं है।
सनातन काल से अच्छे काम को कुछ लोग विवादित बनाते आए हैं। जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं वे नहीं जानते कि विश्व की सभी उपासना पद्धतियों में स्वर और शब्द का उपयोग किया है। जो धर्म स्वर और शब्द में बंधा हो उसके अनुयायी भला योग का विरोध कैसे कर सकते हैं।