2020 कोविड महामारी के रूप में हमेशा याद रहेगा। इस महामारी ने उत्तराखंड में जहां स्वास्थ्य सिस्टम को हिला कर रख दिया, वहीं पर्यटन कारोबार समेत अन्य आर्थिक गतिविधियों को भी तगड़ा झटका दिया। प्रदेश में कोरोना की दस्तक से शुरूआत में उत्तराखंड ठिठक सा गया, लेकिन कोविड से सबक मिलने पर लड़खड़ाते कदम संभल गए।
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उत्तराखंड में कोरोना का पहला मामला 15 मार्च 2020 को मिला था। विदेश से शैक्षिक भ्रमण से लौटे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी का प्रशिक्षु आईएफएस कोरोना संक्रमित मिला था। उस समय प्रदेश में कोविड जांच की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी। जांच के लिए सैंपल चेन्नई भेजे गए। इसके बाद संक्रमण की रफ्तार दिन प्रतिदिन बढ़ती गई।
प्रदेश की मौजूदा स्वास्थ्य सिस्टम के सहारे सरकार के सामने कोरोना संक्रमण से मुकाबला करने की सबसे बड़ी चुनौती थी। स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों की कमी, अस्पतालों में ऑक्सीजन व अन्य स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के बीच कोरोना से लड़ना आसान नहीं था।
संक्रमण रोकने के लिए सरकार ने 22 मार्च से लॉकडाउन घोषित कर दिया। जिससे आवश्यक सेवाओं को छोड़ कर सभी गतिविधियां पूरी तरह बंद हो गईं। सरकार का पूरा फोकस स्वास्थ्य सेवाओं पर था। इसके लिए अस्पतालों में इंतजाम करने में बजट की कमी आड़े नहीं आने दी।
स्वास्थ्य महानिदेेशक के साथ ही मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्यों को स्वास्थ्य व्यवस्थाएं जुटाने के लिए बजट खर्चे का अधिकार दिया गया। सरकार व विभाग का एक ही लक्ष्य था कि किस तरह से कोरोना संक्रमण का सामुदायिक फैलाव रोका जाए।
कोरोना मरीजों के इलाज के लिए डॉक्टरों, पैैरामेडिकल स्टाफ, नर्सों के साथ फ्रंट लाइन कोरोना योद्धाओं ने रात दिन ड्यूटी पर मुस्तैद रह कर कोरोना से जंग लड़ी। वहीं, सरकार ने वेंटीलेटर, ऑक्सीजन सिलिंडर, पीपीई किट, मास्क, सैनिटाइजर, दस्तानों की पर्याप्त व्यवस्था की।
कोरोना दस्तक के दौरान स्वास्थ्य विभाग के पास सौ वेंटीलेटर भी नहीं थे। वहीं, अस्पतालों में ऑक्सीजन युक्त बेड की संख्या भी पर्याप्त नहीं थी। सरकार ने कोरोना मरीजों के उपचार के लिए बुनियादी व्यवस्था पर जोर दिया।