उन्हाेंने कहा कि वर्तमान प्रयास हमारे जैव विविधता के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए हमारी जीवनशैली और नीतियों में बदलाव आवश्यक है। वक्ता ज्योत्सना सिटलिंग ने प्रकृति संरक्षण की चुनौतियों का सामना करने के लिए कुशल मानव संसाधन विकसित करने पर बल दिया और वनों से बाहर की जैव विविधता को बनाए रखने के लिए इन सेवाओं से जुड़े लोगों के कौशल को उचित प्रशिक्षण देकर प्रोत्साहित करने पर जोर दिया।
महासम्मेलन के दौरान ‘जैव विविधता संरक्षण: वन्यजीव और वन कानून’ विषय पर आयोजित सेमिनार के दौरान राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष डॉ. बालकृष्ण पिसुपति ने ‘कंवेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी, बायोलॉजिकल डायवर्सिटी एक्ट-2002 और नगोया प्रोटोकॉल से जुड़े तमाम पहलुओं की जानकारी दी। डॉ. राकेश शाह ने जैव संसाधनों के व्यावसायिक उपयोगों से उत्पन्न लाभाें को स्थानीय समुदायों से साझा करने पर बल दिया।
उन्होंने सूचनाओं के आदान प्रदान को जरूरी बताया। कहा कि देश में बायोडायवर्सिटी एक्ट का अनुपालन तीन स्तरीय तंत्रों पर किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समिति द्वारा किया जा रहा है।