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दुनिया में 17,926 प्रजातियों के वन्यजीवों के अस्तित्व पर खतरा, वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

Sat, 06 Oct 2018 09:24 AM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून
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एफआरआई में अपने वक्तव्य रखतीं वैज्ञानिक
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वन अनुसंधान संस्थान में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता महासम्मेलन के दौरान देश दुनिया के आए विज्ञानियों ने दुनिया में 17026 प्रजातियों के वन्यजीवों के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे पर चिंता जताई। विज्ञानियों ने कहा कि यदि समय रहते जैव विविधता के संरक्षण को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए और इकोलॉजिकल सिविलाइजेशन पर जोर नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया में 52,017 से अधिक प्रजातियां विलुप्त हो जाएगी।

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जैव विविधता संकट एवं चुनौतियां विषय पर व्याख्यान देते हुए भारतीय वन्यजीव संस्थान के निदेशक डॉ. वीबी माथुर ने कहा कि विश्व की 52,017 वन्यजीव प्रजातियों में से 17,926 प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। डोडो, स्टेलर सी काऊ, क्वागा, तस्मानियन वुल्फ  और ग्रेट ऑक जैसे जीव पिछले 400 साल के दौरान विलुप्त हो गए। जबकि गैंगेटिक डाल्फिन, डुगोन, दि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और मणिपुर हिरन विलुप्त होने के कगार पर हैं। उन्होंने विलुप्त होती प्रजातियों के संरक्षण पर जोर दिया।

महासम्मेलन के दौरान अहमदाबाद के पर्यावरण शिक्षा केंद्र के निदेशक डॉ. कार्तिकेय साराभाई ने कहा कि जलवायु के अनुकूूलन और प्रयासों की जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका है। जैव विविधता संरक्षण में भारत की प्राचीन परंपराओं और प्रयासों के विशेष महत्व पर चर्चा करते हुए जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ  इंडिया के पूर्व निदेशक डॉ. के. वेंकटरमनन ने कृषि जैव विविधता जैसे भारतीय चावल, गेहूं, गन्ना, सब्जियां, फल और समुद्री जीवों को जैव विविधता से होने वाले खतरों से आगाह किया।

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जैव विविधता के संरक्षण के लिए एकजुटता पर जोर

उन्हाेंने कहा कि वर्तमान प्रयास हमारे जैव विविधता के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए हमारी जीवनशैली और नीतियों में बदलाव आवश्यक है। वक्ता ज्योत्सना सिटलिंग ने प्रकृति संरक्षण की चुनौतियों का सामना करने के लिए कुशल मानव संसाधन विकसित करने पर बल दिया और वनों से बाहर की जैव विविधता को बनाए रखने के लिए इन सेवाओं से जुड़े लोगों के कौशल को उचित प्रशिक्षण देकर प्रोत्साहित करने पर जोर दिया।

महासम्मेलन के दौरान ‘जैव विविधता संरक्षण: वन्यजीव और वन कानून’ विषय पर आयोजित सेमिनार के दौरान राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष डॉ. बालकृष्ण पिसुपति ने ‘कंवेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी, बायोलॉजिकल डायवर्सिटी एक्ट-2002 और नगोया प्रोटोकॉल से जुड़े तमाम पहलुओं की जानकारी दी। डॉ. राकेश शाह ने जैव संसाधनों के व्यावसायिक उपयोगों से उत्पन्न लाभाें को स्थानीय समुदायों से साझा करने पर बल दिया।

उन्होंने सूचनाओं के आदान प्रदान को जरूरी बताया। कहा कि देश में बायोडायवर्सिटी एक्ट का अनुपालन तीन स्तरीय तंत्रों पर किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समिति द्वारा किया जा रहा है। 
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