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World Environment Day 2021 : प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने बिगाड़ी हिमालयी फिजा

Sat, 05 Jun 2021 01:23 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से जलस्रोतों की संख्या में भी लगातार कमी आ रही है।
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हिमालयी क्षेत्रों का पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा रहा - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार
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मानव द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से हिमालयी क्षेत्रों का पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा रहा है। मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा हिमालयी क्षेत्रों में इसका असर अधिक देखने को मिल रहा है। इसके चलते मध्य हिमालयी क्षेत्र में एक ओर औसत वर्षा में कमी आ रही है, वहीं मौसम चक्र में परिवर्तन का सीधा असर यहां की कृषि और बागवानी पर पड़ रहा है।

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जलवायु परिवर्तन पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में पहुंचे वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से जलस्रोतों की संख्या में भी लगातार कमी आ रही है। इस कारण वहां की वनस्पतियों और जैव विविधता के लिए भी संकट उत्पन्न हो गया है। 

सन 2000 से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार हुई दोगुनी
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की एक रिपोर्ट व भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि देश का सबसे बड़ा ग्लेशियर गंगोत्री ग्लेशियर हर साल 25 मीटर पीछे खिसक रहा है। इतना ही नहीं , केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ओर से बायोलॉजिकल हेल्प आफ रिवर गंगा रिपोर्ट के मुताबिक साल दर साल औसतन तापमान में हो रही बढ़ोतरी के चलते ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
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चिंता की बात यह है कि सन 2000 से 2018 के बीच ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। एक अन्य  रिपोर्ट के मुताबिक उच्च हिमालयी क्षेत्रों में फिलहाल 600 बिलियन टन बर्फ जमा है जो भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान जैसे देशों के लिए पानी का बहुत बड़ा जलस्रोत है। लेकिन जिस गति से ग्लेशियर पिघल रहे हैं वह आने वाले समय के लिए खतरे की घंटी है। 

गंगोत्री समेत इन 30 बड़े ग्लेशियरों पर खतरा ज्यादा
उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित द्रोणागिरी, यमुनोत्री, गंगोत्री, डोकरियानी और बंदरपूंछ जैसे ग्लेशियरों के अलावा चमोली के द्रोणागिरी, बदरीनाथ, सतोपंथ और भागीरथी जैसे ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हुई है। जहां तककुमाऊं  क्षेत्र के बड़े ग्लेशियरों का सवाल  है तो पिथौरागढ़ में मिलम, काली, नामिक, हीरामणि, सोना, पिंजौरा, पोंटिंग, बालटी, मेंओला जैसे ग्लेशियरों के पिघलने में तेजी आई है। इसके साथ ही बागेश्वर में सुंदरडूंगा, सुखराम, पिंडारी, काफनी, मैकटोली के अलावा रुद्रप्रयाग में चौराबाड़ी,  ख़तलिंग और केदारनाथ जैसे ग्लेशियर बड़े ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेज हुई है।

ग्लेशियरों में बर्फ की मात्रा में भी आ रही कमी
पर्यावरण में हो रहे बदलाव के चलते न सिर्फ ग्लेशियरों के पिघलने की गति में तेजी आई है, वरन ग्लेशियरों में बर्फ की मात्रा में भी कमी आई है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक शोध से  पता चलता है कि साल 1975 में इन तमाम ग्लेशियरों पर जितनी बर्फ हुआ करती थी वह साल 2000 में घटकर 87 फ़ीसदी और 2018 में 72 फीसदी तक पहुंच गई।

वनस्पतियों पर पड़ा जलवायु परिवर्तन का असर
शोधों से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन और तापमान बढ़ने से जैव संरक्षित क्षेत्रों में संरक्षित की जा रही वनस्पतियां भी अपना स्थान परिवर्तित कर ऊंचाई की ओर उन्मुख होने लगी है, जो कि पारिस्थितिकी के लिए शुभ संकेत नहीं है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी परिवर्तन आ रहे हैं। परिवर्तन के आधार पर लोगों को अनुकूलित करना जरूरी है, इसके लिए लोगों को जागरूक कर इसे नियंत्रित किया जा सकता है। 
-डॉ.आरएस रावल, डॉयरेक्टर जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण एवं विकास संस्थान अल्मोड़ा

... तो सूख सकती हैं सदानीरा
तापमान में हो रही वृद्धि से ग्लेशियरों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है पिछले 50 वर्षों के शोध के अनुसार गंगोत्री ग्लेशियर अपने स्थान से 900 मीटर पीछे खिसक गया है, इसका सीधा असर मध्य हिमालयी क्षेत्र की पानी की आपूर्ति पर भी पड़ रहा है। अगर इसी गति से ग्लेशियर पिघलते रहे तो सदानीरा रहने वाली नदियों में भविष्य में सूखे की स्थिति आ सकती है।
 -डॉ.भाष्कर निकम, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग देहरादून

11 फीसदी तक घट गई बारिश 
मेरा विभाग आठ वर्षों से यूके के एक विवि के साथ मिलकर एक प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है, इसमें रामगढ़ विकासखंड में पानी पर शोध कार्य किया जा रहा है। क्षेत्र में जल स्तर लगातार गिर रहा है। शोध से संकेत मिल रहे हैं कि पिछले 15 वर्षों में क्षेत्र में शीतकालीन और वसंतकालीन सूखा पड़ रहा है। क्षेत्र में वार्षिक वर्षा का औसत 11 प्रतिशत तक कम हो गया है। पूर्व में साल भर में करीब 66 दिन वर्षा होती थी, जो कि घटकर 55 दिन रह गई है। इसका सबसे प्रतिकूल प्रभाव क्षेत्र के किसानों पर पड़ा है। क्षेत्र में 35 प्रतिशत तक फल और सब्जी उत्पादन में कमी आ गई है। 
-प्रो.पीसी तिवारी, विभागाध्यक्ष डीएसबी परिसर नैनीताल

झरनों में भी कम हुआ पानी 
आबादी के दबाव और शहरीकरण के कारण विश्व भर में झरनों का पानी घट रहा है, इसका प्रभाव झीलों, नदियों और भूजल पर भी पड़ रहा है। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में स्थिति और भी चिंताजनक है, क्योंकि यहां खेती और पेयजल के लिए अधिकतर लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से झरनों पर निर्भर हैं। यदि सामाजिक भागीदारी से जल स्रोतों को बचाने और विकसित करने के गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो भविष्य में स्थिति बहुत बिगड़ सकती है। 
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-डॉ. संतोष मुरलीधर पिंगले, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी रुड़की

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