पहाड़ों में प्रकृति लगातार प्राकृतिक आपदाओं के जरिए कहर बरपा रही है। राज्य के पहाड़ी जिलों रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, जोशीमठ के बाद अब चमोली जिले के घाट विकासखंड के बाजार में बीते माह बाजार में अतिवृष्टि की घटना से जहां दुकानें क्षतिग्रस्त हुईं, वहीं दूसरी ओर चिपको आंदोलन की प्रणेता गौरा देवी के गांव रैणी के लोग ऋषि गंगा का जलस्तर बढ़ने के कारण पलायन कर गुफाओं में आश्रय लेने को मजबूर हुए।
हम विनाश को ही जन्म दे रहे हैं
जुगलान कहते हैं, हिमालय की ऋषि गंगा क्षेत्र में हिमस्खलन से हुई तबाही की बात हो या पिंडर नदी घाटी में पूर्व में आई बाढ़ या फिर 90 के दशक में उत्तरकाशी में आया विनाशकारी भूकंप या इससे पूर्व नदी घाटियों से उपजी बाढ़ की विनाशकारी लीला। कारण लगभग सभी के एक जैसे ही हैं और परिणाम भी एक जैसे ही हैं। आखिर सभी विनाश को ही जन्म दे रहे हैं।
आपदाओं से क्या सबक सीखा
लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हमने इन आपदाओं से क्या सबक सीखा? वर्ष 2013 के जून में आई जल प्रलय के बाद भी हमारी सरकारें वैज्ञानिकों, ग्रामीणों की आवाज यहां तक कि न्यायालयों के आदेशों को भी नहीं सुन पा रही हैं।
आपदाओं की बड़ी वजह बांध हैं
वर्ष 2013 में न्यायालय के आदेशों पर हिमालय के संरक्षण के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति में सरकार की ओर से दिए गए हलफनामे में सरकार ने भी माना है कि उत्तराखंड हिमालय क्षेत्र में आकस्मिक आने वाली इन आपदाओं का कारण बांध परियोजनाएं भी हैं।
एक भी ग्लेशियोलॉजी सेंटर नहीं बना
दूसरा बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह भी है राज्य स्थापना के 20 वर्षों बाद भी हम राज्य में एक भी ग्लेशियोलॉजी सेंटर स्थापित नहीं कर पाए, जो हिमालयी क्षेत्र हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स से पहले यहां की सूक्ष्म जानकारी एकत्र कर अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट जारी कर सके। वाडिया इंस्टीट्यूट सेंटर देहरादून में इसे बनाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन गत वर्ष करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी इसे रोक दिया गया।
पूजा करने के बाद काटते थे पेड़
बात चाहे धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर हो, लेकिन यह सत्य बात है कि हमारे वेद पुराण हमारे पूर्वज भी मानते आए हैं कि प्रकृति देवी है पहाड़ देवता पेड़ पौधों को भी देवताओं का स्थान दिया गया है। हमारे पूर्वज घरों के निर्माण के लिए काटे जाने वाले पेड़ों का एक दिन पूर्व पूजन करते थे। उन्हें वनराज से अनुमति लेकर ही काटा जाता था।