अब जब कई तरह के संकट में अपने को घिरते देखा, तब तक देर हो चुकी। आज जब 25 प्रतिशत सभी तरह की जैवविविधता हम खो चुके और लगभग 10 लाख प्रजातयों को हम खोने की तैयारी में हैं तो समझा जा सकता है कि हम कितने बड़े दोषी हैं। इनको खोने तक ही बात खत्म नहीं होती। इसके साथ बहुत सी अन्य बातें भी जुड़ी हैं। जिनकी समझ हमारे बीच में नहीं है। मसलन किसी भी तंत्र को प्रभावी व उपयोगी बनने के लिए कई तरह की पतस्थितिकी प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है। उसमें उपस्थित सभी तरह के सूक्ष्म से लेकर बड़े जीव व पेड़-पौधों का योगदान उसको उपयोगी बनाने में होता है। किसी भी एक के तंत्र से खोने का मतलब इस महीन प्रक्रिया के रुक जाने से जुड़ा होता है, जिसका असर समयोपरांत दिखाई देता है।
- डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणविद्
जलवायु परिवर्तन और तापमान बढ़ने से हिमालयी क्षेत्रों में वनस्पतियां भी अपना स्थान बदलकर ऊंचाई वाले क्षेत्रों की बढ़ रही हैं। जिन्हें हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सही नहीं माना जा सकता। तापमान में हो रही वृद्धि ग्लेशियरों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। वे तेजी से पिघल रहे हैं। सदानीरा रहने वाली नदियों का भविष्य इससे संकट में है। वर्तमान में हमारी सोच मोटर-गाड़ी-बंगला तक सीमित होकर रह गई है। प्रकृति को हम भूलते जा रहे हैं। ये भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
- विनोद जुगलान, पर्यावरण सचेतक व शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के उत्तराखण्ड प्रांत पर्यावरण प्रमुख
पृथ्वी पर प्रत्येक मनुष्य का जीवन बचा रहे, इसके लिए प्रत्येक परिस्थितिक तंत्र का बने रहना जरूरी है। पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन और पारिस्थितिक तंत्र से संतुलन इन दोनों का ही महत्त्व है। प्रत्येक वेटलैंड का अपना पर्यातंत्र होता है अर्थात पारिस्थितिक तंत्र होता है। जैव विविधता होती है, वानस्पतिक विविधता होती है। ये वेटलैंड जलजीवों, पक्षियों आदि प्राणियों के आवास होते हैं। वेटलैंड के जल संरक्षण, जल प्रबंधन के पीछे यही उद्देश्य है कि जल के संरक्षण के साथ-साथ उनके पारिस्थितिक तंत्र को भी संरक्षण दिया जाए।
- प्रो.पीसी तिवारी, विभागाध्यक्ष डीएसबी परिसर नैनीताल