प्रकृति संरक्षण का जज्बा हमारे संस्कारों से जुड़ा होना चाहिए। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति के साथ समन्वय जरूरी है, लेकिन आज विकास के नाम पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। गांधी शांति पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट ने अमर उजाला से खास बातचीत में यह बात कही।
वे कहते हैं कि अपने आसपास के पर्यावरण को शुद्ध रखना मनुष्य के संस्कारों में होना चाहिए। इसके लिए किसी को जागरूक करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। कोरोना महामारी के कारण घोषित लॉकडाउन के कारण आज नदियां शुद्ध हो गई हैं और पर्यावरण स्वच्छ हो गया है। पहले लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर चलते थे।
लोग बुग्यालों में नंगे पांव जाते थे, जिससे बुग्यालों को नुकसान न हो, हिमालय क्षेत्र में ऊंची आवाज में बात नहीं करते थे, जिससे ग्लेशियर न टूटे और वन देवियों के डर से बिना वजह जड़ी-बूटियों का दोहन नहीं करते थे। यानी प्रकृति संरक्षण के लिए लोगों को धार्मिक मान्यताओं से भी जोड़ा गया था, लेकिन मौजूदा समय में लोग पर्यावरण का दोहन कर रहे हैं। जब तक हमारे संस्कारों में पर्यावरण संरक्षण की ललक पैदा नहीं होती तब तक दूषित पर्यावरण के दुष्प्रभाव झेलने पड़ सकते हैं।
कार्बन उत्सर्जन कम होने के कारण पर्यावरण रहा सुरक्षित
लॉकडाउन के कारण पिछले तीन महीनों से डीजल व पैट्रोल से निकलने वाला कार्बन उत्सर्जन एवं प्रदूषक कम होने के कारण प्राकृतिक वनस्पतियों, ग्लेशियरों और नदियों को जीवनदान मिला। वहीं चारधाम यात्रा शुरू न होने के कारण हाई एल्टीट्यूट पर हवाई सेवाओं की ध्वनि तरंगें और मानवीय गतिविधियां न होने के कारण पर्यावरण भी सुरक्षित रहा।
बदरीनाथ यात्रा पर पिछले तीन सालों में कुल 2,98,189 वाहनों से देश के विभिन्न राज्यों से यात्री बदरीनाथ आए। लेकिन इस बार यात्रियों के न आने से वाहन भी कम आए। ऐसे में कार्बन उत्सर्जन एवं प्रदूषक और मानवीय गतिविधियां कम हुईं हैं जिससे हनुमान चट्टी से बदरीनाथ के आसपास तक 8-10 जगहों पर अभी भी एक फुट बर्फ जमी है। घरेलू अपशिष्ट में कमी होने के कारण नदियों का जल भी स्वच्छ रहा।
पीजी कॉलेज ऋषिकेश के प्रोफेसर राजेश नौटियाल का कहना है कि मानवीय गतिविधियां सीमित होने के कारण तापमान में भी कमी आई। कई जगह बर्फ नहीं पिघली। ये बर्फ नदियों के लिए वाटर रिचार्ज का काम करेगी।