वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों के मुताबिक उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण का अध्ययन किया जा सके इसके लिए गंगोत्री से आगे भोजवासा और चीड़वासा में मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित किए हैं। दुनिया में यह पहली बार है जब वाडिया की ओर से इतनी ऊंचाई पर स्टेशनों की स्थापना की है।
संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी का कहना है कि फिलहाल देशभर में 22 वेधशालाएं स्थापित हैं। जिसमें कई वैज्ञानिक पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं। लेकिन, यह पहली बार है जब हिमालयी क्षेत्रों में ब्लैक कार्बन के चलते पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने को लेकर मॉनिटरिंग स्टेशनों की स्थापना की है।
वैज्ञानिकों की मानें तो ब्लैक कार्बन हरियाणा और पंजाब के विभिन्न इलाकों में हर साल जलाई जा रही पराली की वजह से पहुंच रहा है। इसके अलावा यूरोपीय देशों के कार्बन उत्सर्जन का भी खासा असर पड़ रहा है।
वैज्ञानिकों की मानें तो ब्लैक कार्बन से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कृत्रिम गर्मी बढ़ रही है। ब्लैक कार्बन दिन में सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करने के साथ ही उसे चौबीसों घंटे इन्फ्रारेड के रूप में उत्सर्जित करता है। जिससे क्षेत्र में कृत्रिम गर्मी पैदा हो रही है। इसका असर पर्यावरण पर पड़ रहा है।
बता दें कि देश दुनिया में पर्यावरण में आ रहे बदलाव का किस तरीके से अध्ययन किया जाए इसके लिए साल 2008 में इटली में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सेमिनार का आयोजन किया था। उसमें वाडिया के वैज्ञानिक डॉक्टर पीएस नेगी को भी बुलाया गया था।
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण में आ रहे बदलाव और ब्लैक कार्बन की लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। इसके लिए भोजवासा, चीड़वासा में मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित किए हैं। अब तक के अध्ययन में बात सामने आई है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 0.01 से 4.62 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर की दर से कॉर्बन जमा हो रहा है। जो हिमालय के पर्यावरण के लिए खतरनाक है।
-डॉ. पीएस नेगी, वरिष्ठ वैज्ञानिक वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी