वास स्थल भी प्रभावित
वन भूमि हस्तांतारण, अतिक्रमण जैसे कारणों से वास स्थल भी प्रभावित हुए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, जंगल के किनारे गन्ना, धान की खेती के चलते भी गजराज फसलों को खाने के लिए आबादी वाले इलाकों में पहुंच रहे हैं। यहां पर कई बार उनको भगाने के लिए शोर आदि किया जाता है। इससे कई जगह उनके व्यवहार में आक्रामक होने की बात भी कही जा रही है।
ट्रेनों का रूट बन रहा मुसीबत
ट्रेनों की टक्कर और बिजली के करंट से हाथी मर भी रहे हैं। तराई केंद्रीय वन प्रभाग के अंतर्गत लालकुआं-गूलरभोज रेलवे ट्रैक, देहरादून-हरिद्वार, हरिद्वार-लक्सर रेलवे ट्रैक पर हाथियों के ट्रेन से टकराने की घटनाएं हो चुकी हैं। तराई केंद्रीय वन प्रभाग की एसडीओ शशिदेव के मुताबिक, एक दशक में 10 हाथियों की मौत हुई है। हादसों में कमी लाने के लिए रेलवे संग मिलकर कार्य किया जा रहा है। उधर, हरिद्वार वन प्रभाग में भी एक दशक में तीन हाथियों की मौत ट्रेन से कटने से हुई है।
हाथी जंगल से बाहर न जाएं, इसके लिए वास स्थल सुधार का कार्य किया जा रहा है। -साकेत बडोला, निदेशक, कार्बेट टाइगर रिजर्व
घास के मैदान विकसित करने के साथ जंगल में पानी की व्यवस्था को और बेहतर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। -एनसी पंत, डीएफओ, वन प्रभाग लैंसडौन
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तराई के जंगलों में हाथियों की अच्छी संख्या है। मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए ट्रेन से हाथियों के टकराने की घटनाओं के लिए ही जल्द रेलवे के साथ मिलकर योजना तैयार की जाएगी। -समीर सिन्हा, प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव