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विदेशों में भी है पतंजलि योगपीठ का बोलबाला

Fri, 20 Dec 2013 10:41 AM IST
अमर उजाला, हरिद्वार
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आयुर्वेद के क्षेत्र में अपने शोध-पत्रों को प्रमाणित कराने के लिए दुनियाभर से वनस्पति विद्वान हरिद्वार के पतंजलि योगपीठ आ रहे हैं।
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दूसरी ओर, योग और आयुर्वेद को विदेशों में सम्मान दिलाने वाले पतंजलि परिवार की स्थिति भारत में घर का जोगी जोगना जैसी है। पतंजलि योगपीठ में पिछले करीब 10 वर्षों से जड़ी-बूटियों के क्षेत्र में गहन अनुसंधान कार्य चल रहा है।

लुप्त हो रही वन औषधियां पतंजलि में
दुनिया के कईं क्षेत्रों में लुप्त हो रही वन औषधियों को पतंजलि उद्यान में वही वातावरण उत्पन्न कर उगाया भी गया है।

इस समय न केवल अमेरिका व ब्रिटेन अपितु यूरोप के कईं देशों से आयुर्वेद विज्ञानी पतंजलि में हो रहे कार्यों को देखने के लिए लगातार आ रहे हैं।

चीन, फिलीपींस, इंडोनेशिया और मलेशिया से प्रति माह कोई न कोई दल अपने आयुर्वेद शोध-पत्रों पर प्रमाणन लेने के लिए पतंजलि योगपीठ आता है। दूसरी ओर, भारत में पतंजलि के शोध कार्यों को मान्यता भी नहीं दी जाती।
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विश्व वनस्पति इनसाइक्लोपीडिया तैयार करने में जुटे
पतंजलि योगपीठ में 21 वैज्ञानिक पिछले अनेक वर्षों से विश्व वनस्पति इनसाइक्लोपीडिया को तैयार करने में जुटे हैं। करीब 10 खंडों में प्रकाशित हो इनसाइक्लोपीड़िया में करीब 160 देशों में इस्तेमाल की जा रही वन औषधियों एवं वनस्पतियों का वर्णन दिया गया है।

कोशिश है कि आयुर्वेद की इस प्राचीनतम पद्धति को नए संदर्भों में विश्व के सामने रखा जाए। जो बूटियां लुप्त हो गयी हैं अथवा हो रही हैं, उनकी खोज कर उन्हीं देशों में पुन: उगाया जाए जहां वे मूल रूप से मिलती हैं। अनुसंधान कार्य में भाग लेने के लिए समय-समय पर विदेशों से भी वैज्ञानिक डेपुटेशन पर पतंजलि योगपीठ आ रहे हैं।

जड़ी-बूटियों से जुड़ी चालीस पद्धतियां
विश्व में केवल ऐलोपैथी ही काम नहीं करती। जड़ी-बूटियों से जुड़ी हुई 40 पद्धतियां विदेशों में प्रचलित हैं। उनका अध्ययन करने से पता चलता है कि सभी का मूल भारतीय आयुर्वेद में है।

चीन, तिब्बत और फिलीपींस के ग्रंथों में तो यह उल्लेख मिलता है कि अमुक जड़ी-बूटी के बारे में विस्तृत जानकारी भारतीय आयुर्वेदिक ग्रंथों से ली गयी है। जर्मनी, स्पेन, स्वीडन और आस्ट्रिया में आयुर्वेद से जुड़े ग्रंथों में मूल की बाबत भारत का संदर्भ दिया गया है।

जनक हम, तो हमें मिले पोषण
आचार्य बालकृष्ण के अनुसार यह प्रमाणित हो गया है कि विश्व की सभी चिकित्सा पद्धतियों का जन्म आयुर्वेद से हुआ है। जिन देशों में यह मान लिया है उन देशों से भारत में आयुर्वेद के विकास के लिए भरपूर पोषण मिलना चाहिए।
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चीन और जर्मनी इसके लिए तैयार भी हैं। भारत सरकार की चूंकि कोई रुचि इस दिशा में नहीं है, अत: आयुर्वेद अनुसंधान का कार्य बहुत पिछड़ा हुआ है। यहां तक बोटैनिकल सर्वे आफ इंडिया के विद्वानों को भी सही तथ्यों की जानकारी नही हैं।

कईं संदर्भों में संस्थान के वैज्ञानिक आयुर्वेद विश्वविद्यालयों एवं पतंजलि योगपीठ से अपनी जानकारियों को पुष्ट कराते हैं।
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