संक्रमित गर्भवती से बच्चे को खतरा
अब से दो दशक पहले तक ह्यूमन इम्युनोडेफिशियेंसी वायरस (एचआईवी) को जानलेवा माना जाता था, लेकिन चिकित्सा जगत में हुई तरक्की और डॉक्टरों के प्रयास से इस बीमारी से होने वाली मृत्यु पर काफी हद तक काबू पाया गया है। वैसे तो संक्रमण फैलने के कई माध्यम हो सकते हैं, लेकिन गर्भवती महिला से उसके बच्चे को यह संक्रमण होने की आशंका सबसे अधिक होती है। एचाईवी ही अक्वायर्ड इम्युनोडेफिशियेंसी सिंड्रोम (एड्स) का कारण बनता है।
जन्म के बाद नवजात को देनी होती है दवा
एचआईवी संक्रमित महिला को गर्भधारण के तीसरे महीने से ही एंटी रेट्रो वायरल (एआरटी) की दवा देना शुरू कर दिया जाता है। सुरक्षित प्रसव किट के माध्यम से संस्थागत प्रसव कराया जाता है। प्रसव के आधा घंटे के भीतर नवजात को डॉक्टर की मौजूदगी में एक दवा दी जाती है। अधिकतम पांच दिन के भीतर यह डोज देनी होती है। इसके ठीक 45 दिन बाद सीपीटी की दवा दी जाती है। फिर बच्चे की एचआईवी जांच कराई जाती है। ऐसे मामलों में 18 महीने तक दवा चलती है। वहीं, इन बच्चों के माता-पिता का उम्रभर उपचार चलता है।
पॉजिटिव मां से बच्चे को खतरा
पिंक क्लीनिक की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. पल्लवी सिंह ने बताया कि गर्भवतियों की पहली सभी जांच के साथ एचआईवी जांच भी की जाती है। एचआईवी के लक्षण न होने पर भी गर्भवती एचआईवी संक्रमित हो सकती है। दरअसल, गर्भ में पल रहा शिशु अपने पोषण के लिए मां पर ही निर्भर रहता है। ऐसे में उसके संक्रमित होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। अच्छी बात यह है कि अब उपचार से ऐसे बच्चों को एचआईवी संक्रमण से बचाया जा सकता है जिनकी मां एचआईवी संक्रमित हैं।
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ऐसे फैलता है एड्स -
- संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध बनाना।
- ब्लड ट्रांसफ्यूजन के दौरान शरीर में एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाना।
- एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति पर इस्तेमाल की गई सुई लगाना।
- एचआईवी पॉजिटिव गर्भवती गर्भावस्था के समय, प्रसव के दौरान या इसके बाद अपना दूध पिलाने से नवजात शिशु को संक्रमण ग्रस्त कर सकती है।