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तीर्थनगरी में तैयार हो रही वेदों की नयी पौध

Mon, 24 Apr 2017 03:58 PM IST
हेमवती नंदन भट्ट/ अमर उजाला, ऋषिकेश
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वेद - फोटो : demo pic
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तीर्थनगरी ऋषिकेश में श्रीस्वामी नारायण आश्रम वैदिक ऋषिकुल देवभूमि उत्तराखंड में वेदपाठियों की नई पौध तैयार करने में जुटा है।
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वेदों के मूल स्रोत और उनकी शाखाओं के निरंतर लोप होने से समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभावों के दृष्टिगत संस्था द्वारा वेद अध्ययन की कक्षाएं एक दशक से संचालित कर रहा है। ऋषिकुल ने 2006 में वेद की दो शाखाओं का पठन-पाठन शुरू किया था। 2016 से यहां वेद की एक और शाखा अथर्ववेद का अध्ययन कराया जा रहा है।

गौरतलब है कि यह संस्थान राज्य में वेद की तीन शाखाओं का निशुल्क अध्ययन कराने वाला पहला संस्थान है। तीर्थनगरी के मुनिकीरेती के दयानंदनगर (शीशमझाड़ी) स्थित वैदिक ऋषिकुल बीते एक दशक से वेद की शाखाओं को लुप्त होने से बचाने के प्रयासों में जुटा है।
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यह उत्तराखंड में वेद की शुक्लयजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा, सामवेद की कौथुम शाखा और अथर्ववेद की शौनक शाखा का अध्ययन कराने वाला एकमात्र संस्थान है। 2006 में ऋषिकुल में वेद की दो शाखाओं सामवेद और शुक्लयजुर्वेद का अध्ययन महज 15-20 बच्चों से शुरू किया गया था। वर्तमान में यह संख्या 70 से अधिक हो गई है। बीते साल मार्च-2016 में बनारस के अथर्ववेद के विद्वान पं. अभिषेक पांडेय के सहयोग से यहां अथर्वदेव की शौनक शाखा का अध्ययन कराया जाता है। 
 
छह विद्यार्थी तिरुपति में कर रहे वेद से स्नातक      
स्वामी नारायण आश्रम वैदिक ऋषिकुल के सहयोग से पहले बैच के छह वेद के विद्यार्थी बीते साल से तिरुपति वेद विश्वविद्यालय आंध्र प्रदेश में सामवेद से स्नातक कर रहे हैं। गोविंद कुमार गौड़, अंकित पाठक, कुलदीप पाठक आदि बच्चों ने इस साल शास्त्री प्रथम वर्ष की परीक्षा दी। नये सत्र में भी ऋषिकुल के कुछ छात्र सामवेद से शास्त्री कक्षा के लिए तिरुपति वेद विवि जाने की तैयारी में हैं।       
   
सामवेद के अध्ययन के बाद बच्चों को पीएचडी के बाद रोजगार के अच्छे अवसर उपलब्ध हैं। अब तक यहां पर वेद अध्ययन का माहौल नहीं था, धीरे धीरे इसका प्रयास किया जा रहा है। उत्तराखंड के अलावा उत्तर प्रदेश, हिमाचल के बच्चे भी यहां अध्ययन के लिए आ रहे हैं।      
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- आचार्य दिलीप कुमार त्रिपाठी, सामवेद आचार्य
    
वेद की चारों शाखाओं का विकास जरूरी है। यह प्रयास देवभूमि से हो रहा है यह अच्छा संकेत है। भारतीय वेदों को यूनेस्को ने भी विश्व धरोहर माना है। सरकार को मूल परंपराओं के संरक्षण को आगे आना चाहिए।       
- डा. नारायण प्रसाद भट्टराई, सहायक आचार्य उत्तराखंड संस्कृत विवि, हरिद्वार
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