बच्चों का अगर समय से टीकाकरण करा दिया जाए तो वे बीमारी से सुरक्षित रहेंगे, उनके शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित हो जाएगी।
अगर कभी बीमारी उन्हें पकड़ेगी भी तो स्थिति नाजुक नहीं होगी। टीकाकरण से बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। यही वजह है कि कभी इंफेंट किलर कही जाने वाली डिप्थीरिया, गलघोंटू आदि बीमारियां कम हो गईं और बच्चों की मृत्यु दर में गिरावट आई है।
टीकाकरण अभियान का ही नतीजा है कि अब बच्चों की मृत्यु दर में लगातार गिरावट आ रही है। डेढ़-दो दशक पहले बच्चों की मृत्यु दर प्रति एक हजार 164 बच्चे रही है।
एनुअल हेल्थ सर्वे और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की जो ताजा रिपोर्ट आई है, उसमें राष्ट्रीय स्तर पर प्रति एक हजार बच्चों पर मृत्यु दर घट कर 37 हो गई है। इसे न्यूनतम पर लाने के लिए प्रयास जारी हैं। इसी कड़ी में अमर उजाला यूनीसेफ के साथ मिलकर टीकाकरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चला रहा है।
संयुक्त निदेशक राष्ट्रीय कार्यक्रम एवं राज्य प्रतिरक्षण अधिकारी डॉ. डीके चक्रपाणि का कहना है कि टीकाकरण की वजह से ही इंफेंट किलर कही जाने वाली गलघोंटू, डिप्थीरिया, टीबी आदि रोगों से बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है। इन बीमारियों के संक्रमण के साथ बच्चों को निमोनिया, इंसेफेलाइटिस, न्यूराइटिस, मांसपेशियों की तकलीफ आदि रोग हो जाते थे, जो मृत्यु का कारण बनते थे। इनमें भी कमी आई है। टीकाकरण से बच्चों की सेहत तो सुरक्षित होती ही है, साथ ही बच्चों की बीमारियों में खर्च होने वाला बजट घटता है।
बच्चों के टीकाकरण से परिवारों को आर्थिक सुरक्षा भी मिलती है। बच्चों की बीमारियों में आने वाला खर्च बच जाता है। बीआरओ के पूर्व अधिकारी महेंद्र सिंह समेत बच्चों का टीकाकरण कराने वाले अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को वैक्सीन लगवाने से आत्मविश्वास आता है।
लोगों में भ्रम
- वैक्सीन के कारण बच्चों को बुखार आ जाता है
- बच्चों में कमजोरी आ जाती है
- बच्चों को बड़े होने पर दिक्कत आती है
- बच्चों की मौत हो जाती है
वरिष्ठ बालरोग विशेषज्ञ एवं महानिदेशक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के डा. डीएस रावत के मुताबिक टीका लगने के बाद बुखार आने का मतलब है कि टीके ने काम किया है। दरअसल टीका लगने से शरीर प्रतिक्रिया करता है, इससे बुखार आता है। इससे बच्चों में न कमजोरी आती है और न ही बड़े होने पर कोई दिक्कत होती है।