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Dehradun News: एशिया की सबसे बड़ी कोयला खदान में अब महिलाएं भी चलाएंगी शॉवेल

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एशिया की सबसे बड़ी कोयला खदान में अब महिलाएं भी चलाएंगी शॉवेल
गेवरा कोयला खदान में टूटेगी पुरुषों के एकाधिकार की दीवार
इसके लिए महिलाओं को दिया जा रहा है प्रशिक्षण

छत्तीसगढ़ से बिशन सिंह बोरा

कोरबा (छत्तीसगढ़): एशिया की सबसे बड़ी ओपन कास्ट कोयला खदान, ''गेवरा'' में एक नया इतिहास रचने जा रहा है। अब तक केवल पुरुषों के वर्चस्व वाले और जोखिम से भरे माने जाने वाले शॉवेल के संचालन के काम में पहली बार महिलाएं उतरने जा रही हैं। खदान में जल्द ही महिलाएं भारी शॉवेल को ऑपरेट करती नजर आएंगी।
गेवरा कोयला खदान की स्टाफ ऑफिसर (एचआर) सुधा शिंदे के अनुसार, पहले कंपनी में महिलाएं केवल एचआर और प्रशासनिक अनुभागों तक ही सीमित थीं। लेकिन इस ऐतिहासिक पहल से न केवल महिलाओं को खुद को साबित करने का मौका मिलेगा, बल्कि खदान की कार्यक्षमता में भी बढ़ोतरी होगी। इस काम के लिए 50 महिलाओं का चयन किया गया था, जिनमें से 17 महिलाओं ने तमाम चुनौतियों को स्वीकार करते हुए काम करने की सहमति दी है। इन महिलाओं को पूरी तरह से दक्ष बनाने के लिए तीन चरणों में कड़ा प्रशिक्षण दिया गया है।गेवरा प्रोजेक्ट के महाप्रबंधक (संचालन) धीरज चौधरी ने बताया कि प्रशिक्षण प्रक्रिया पूरी होने के बाद इस साल के अंत तक इन सभी महिलाओं को खदान में नियमित नियुक्तियां देकर तैनात कर दिया जाएगा।
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आशा ने दुखों को पछाड़कर बनाई नई पहचान
कोरबा। मुंगेली जिले की रहने वाली 42 वर्षीया आशा सोनी की कहानी इस पूरी पहल की सबसे प्रेरणादायक मिसाल है। चार साल पहले कैंसर के कारण पति को खोने के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी आशा के कंधों पर आ गई। जब उन्होंने सोवेल चलाने का फैसला किया, तो शुरुआत में परिजनों ने इसे खतरनाक बताकर मना किया। लेकिन आशा ने अपने फैसले से पीछे हटने के बजाय परिवार को समझाया और आगे बढ़ने की ठानी। आशा सोनी के साथ अन्नपूर्णा, धीरजा, पूर्णिमा, सौम्या और रोशनी जैसी अन्य 16 महिलाएं भी सामाजिक बंधनों को तोड़कर इस नए सफर की ओर कदम बढ़ा चुकी हैं। विभागीय अधिकारियों ने बताया कि इन महिलाओं की यह पहल न केवल कोयला उद्योग में लैंगिक समानता की नई मिसाल कायम करेगी, बल्कि देश भर की महिलाओं को लीक से हटकर नए क्षेत्रों में कदम रखने के लिए भी प्रेरित करेगी।

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इस काम आता है शॉवेल

कोरबा। कोयला खदानों (विशेषकर खुली खदानों या ओपन-कास्ट माइंस) में शॉवेल का उपयोग मुख्य रूप से उत्खनन के लिए किया जाता है। इसके जरिए कोयले और मिट्टी को डंपर में भरा जाता है बताया गया है कि यहा डंपर में एक बार में 240 टन कोयला भरा जाता है।
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संग्रहालय में देखा आदिवासी जनजाति के संघर्ष को
रायपुर। पीआईबी देहरादून के सहायक निदेशक संजीव सुंद्रियाल के नेतृत्व में उत्तराखंड के पत्रकारों का दल शुक्रवार को शहीद वीर नारायण सिंह स्मारक सह जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संग्रहालय पहुंचा। यहां पत्रकारों ने प्रतिमाओं और दुर्लभ तस्वीरों के माध्यम से आदिवासियो के संघर्षों को देखा, यह संग्रहालय डिजिटल है, जिसमें आदिवासी जनजाति लोगों के संघर्षों के साथ ही उनकी संस्कृति, वेशभूषा, लोक परंपराएं और आजादी में उनके योगदान को दर्शाया गया है।
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