अदिति पी कौर करीब 23 साल से बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ रही हैं। वह बाल श्रम, नशा प्रवृति, बच्चों की सुरक्षा समेत कई विषयों पर काम कर रही हैं। वह चाइल्ड लाइन से भी जुड़ी हैं। अदिति ने कहा कि महिलाएं जब किसी भी क्षेत्र में काम करती हैं तो पहले उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता। उन्हें पुरुषों की तुलना में अधिक साबित करना पड़ता है। जबकि, महिलाएं क्षमतावान होती हैं। हमें समाज की मानसिकता को बदलना होगा।
वंचित बच्चों को शिक्षा दे रही डॉ. गिरिबाला
डॉ. गिरिबाला पिछले 30 सालों से वंचित बच्चों को शिक्षा देने का काम कर रही हैं। सबसे पहले उन्होंने कौलागढ़ स्थित मजदूर्र-बस्ती के बच्चों के लिए पाठशाला का संचालन किया। यहां 20 से ज्यादा बच्चों को रोजाना शाम को तीन घंटे की कक्षा दी जाती है। यहां गणित, अंग्रेजी, हिंदी, विज्ञान के साथ योग, डांस, सिंगिंग की ट्रेनिंग भी दी जाती है। वर्तमान में उन्होंने सुद्धोवाला में भी पाठशाला शुरू की है। डॉ. गिरिबाला ने बताया कि अगर बच्चों को शिक्षा मिल जाए तो गरीबी एवं अज्ञानता को दूर किया जा सकता है।
फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बना रही पारुल
पारुल कैंथ ने जब फिल्म इंडस्ट्री में करियर बनाने का फैसला किया तो उन्हें कई लोगों ने ताने मारे। कहा कि फिल्म इंडस्ट्री लड़कियों के लिए नहीं है। लेकिन, पारुल ने भी ठान लिया था कि वह इसी क्षेत्र में पहचान बनाकर रहेंगी। आज पारुल फिल्म मेकिंग, राइटर की भूमिका निभा रही हैं। इसके अलावा वह सोशल मीडिया सेक्टर में भी काम करती हैं। पारुल ने बताया कि लड़कियों को पहले परिवार को मनाना होता है। उसके बाद समाज के रूप में चुनौती आती है। लेकिन, जब महिला कुछ करने की ठान लेेती है तो कुछ भी असंभव नहीं है।
लोक कला को पहचान दिला रहीं रेखा धस्माना
रेखा धस्माना उनियाल एक ऐसा नाम है, जिन्होंने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को पहचान दिलाई है। उनकी गिनती प्रदेश के चुनिंदा गायिका में होती है। रेखा ने कहा कि उन्हें बचपन से गाने का शौक रहा। लेकिन, आसपास के लोग गायिकी में बेटियों को नहीं जाने देते थे। लेकिन, उन्होंने इसकी चिंता नहीं की। कहा कि 1990 के दशक में वह दिल्ली गई तो उन्हें समुदाय विशेष के लोग संस्कृति को लेकर ताना मारा करते थे। इसके बाद उन्होंने कला के क्षेत्र में सर्वस्व समर्पित कर दिया। आज वही लोग प्रदेश की संस्कृति की सराहना करते हैं।
गांव-गांव में योग सिखा रही सीमा
सीमा जौहर की गिनती योग के सर्वश्रेष्ठ शिक्षिकाओं में होती है। वह गांव-गांव में आम लोगों को योग की जानकारी पहुंचा रही हैं। वह लोगों को योग सिखाती हैं। योग के माध्यम से निरोग जीवन जीने को प्रेरित कर रही हैं। सीमा ने कहा कि अगर योग और कीर्तन को अपनाया जाए तो जीवन को सफल बनाया जा सकता है। वह यही मंत्र लोगों को देती हैं। उन्हें लोगों की सेवा करके सुखद अनुभव होता है। सीमा पतंजलि महिला समिति में भी प्रमुख जिम्मेदारी निभा रही हैं।
भले ही आज राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने की बात होती है, लेकिन जब भी महिलाओं को मौका मिलता है तो उनके पति या बेटे महिलाओं को रबर स्टांप के रूप में इस्तेमाल करते हैं। लेकिन, पुरोहितवाला की ग्राम प्रधान मीनू छेत्री प्रधानपति की परंपरा को आईना दिखा रही हैं। मीनू अपने सरल स्वभाव एवं काम की बदौलत लगातार तीसरी बार चुनकर आई हैं। वह प्रधानपति परंपरा के खिलाफ खुलकर आवाज बुलंद करती हैं।
करियर छोड़, स्वरोजगार को चुना
सृष्टि काला और श्वेता अग्रवाल स्वरोजगार के क्षेत्र में महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं। दोनों ने मिलकर डेयरी फार्म खोला है। यहां 40 गायें रखी हैं। मेहनत एवं बेहतर योजना के दम पर उन्होंने इस व्यवसाय में सफलता हासिल की। सृष्टि व श्वेता ने कहा कि उनके सामने करियर के लिए कई विकल्प थे, लेकिन उन्होंने डेयरी फार्म चुना। उनके व्यवसाय में 22 लोगों को रोजगार मिल रहा है। कहा कि वह कांच की बोतल में पैक दूध बेचते हैं, ताकि प्लास्टिक के प्रयोग से बचा जा सके और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे सकें। सृष्टि आईटी पार्क (सहस्त्रधारा रोड) व श्वेता मिलन विहार (जीएमएस रोड) की रहने वाली हैं।
महिला-बेटियों का भविष्य बना रही मेघा
मेघा मल्ल कई सालों से झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे वंचित एवं शोषित महिला-बच्चियों को सुखद जीवन देने की दिशा में काम कर रही हैं। मेघा ने युवती नामक संस्था बनाई है। इसके माध्यम से मेघा शोषित महिला-बच्चियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक कर रही हैं। साथ ही उन्हें आवश्यक सहायता भी मुहैया करा रही हैं। मेघा ने कहा कि वह सामान्य परिवार से पली हैं। विवाह के बाद उनके सामने भी कई क्षेत्रों में करियर बनाने के विकल्प थे, लेकिन उन्होंने जरूरतमंद लोगों में अपना भविष्य तलाशा।
सरकारी नौकरी छोड़ म्यूजिक बैंड में पाया मुकाम
स्वाति सिंह ने सरकारी नौकरी छोड़कर म्यूजिक बैंड की दुनिया में खास पहचान बनाई है। स्वाति कहती हैं कि जब उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी तो उन्हें कई लोगों ने पागल तक कहा था। कहते थे बैंड की दुनिया लड़कियों के लिए नहीं है। इनके बैंड को बुलाएंगे तो इन्हें सामान लाने-ले जाने की दिक्कतें उठानी पड़ेंगी। इसलिए पुरुषों के बैंड को ज्यादा तवज्जो दी जाती रही। लेकिन, वह अपने जुनून को दबाना नहीं चाहती थी। उन्होंने दिखा दिया कि लड़कियां किसी से कम नहीं हैं। उनके बैंड की सभी लड़कियां बेहद प्रोफेशनल हैं। आज ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां उनकी परफॉर्मेंस नहीं होती।