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लोकसभा चुनाव में अभी भी पीछे आधी दुनिया

Sun, 30 Mar 2014 02:12 PM IST
चंद्रशेखर जोशी/ अमर उजाला, चंपावत
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उत्तराखंड की कैबिनेट में भले ही इस समय दो महिला मंत्री हों, लेकिन लोकसभा में प्रतिनिधित्व के मामले में स्थिति निराशाजनक ही है।
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महिला नेता को संसद में बैठने का अवसर नहीं मिला
अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट से कभी भी किसी महिला नेता को संसद में बैठने का अवसर नहीं मिला है। चंपावत जिले के बनबसा से लेकर अल्मोड़ा जिले तक फैली इस सीट से एक उपचुनाव मिलाकर कुल 16 सांसद लोकसभा में बैठ चुके हैं।

लेकिन इनमें से एक भी नाम किसी महिला नेता का नहीं है। यहां तक कि मुख्य दलों ने महिलाओं को प्रत्याशी बनाना तक उचित नहीं समझा। सिर्फ एक बार साल 2004 में कांग्रेस ने मुख्यमंत्री हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत को टिकट दिया।
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तब रेणुका भाजपा उम्मीदवार से हार गईं। इस बार भाजपा से एक महिला नेता रेखा आर्या का नाम सीईसी (केंद्रीय चुनाव समिति) तक गया, लेकिन वह नाम भी अजय टम्टा के आगे नहीं टिक सका।

अल्मोड़ा सीट में महिला कभी सांसद नहीं बनी, मगर नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से फरवरी 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में पूर्व रक्षा मंत्री केसी पंत की पत्नी इला पंत ने भाजपा के टिकट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता एनडी तिवारी को हराया था।

एक भी महिला विधायक नहीं
अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 14 विधानसभा सीटों से इस समय एक भी महिला विधायक नहीं है।

साल 2012 के विधानसभा चुनावों में सोमेश्वर, डीडीहाट और गंगोलीहाट से महिला प्रत्याशी दूसरे और चंपावत सीट से तीसरे नंबर पर रहीं।

उत्तराखंड विधानसभा के लिए 2002, 2007 और 2012 में तीन बार चुनाव हो चुके हैं, लेकिन अल्मोड़ा सीट से मात्र एक महिला विधायक निर्वाचित हुईं। 2007 में चंपावत सीट से बीना महराना ने जीत दर्ज की थी।
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महिलाओं को आमतौर पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है। जीतने की क्षमता, सियासी समीकरण और अन्य कई कारणों से टिकट तय होते हैं। बावजूद इसके महिलाओं को टिकट देने के मामले में कांग्रेस का रिकार्ड भाजपा से बेहतर है।
- निर्मला गहतोड़ी, एआईसीसी सदस्य, कांग्रेस
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